मंगलवार, 20 जून 2017

राज नारायण बोहरे की एक और कहानी

अस्थान
               
      अखिल ब्रह्माण्ड नामक परात्पर ब्रह्म परमात्मा की जय ! सम्प्रदाय के आदि आचार्य महराज की जय! गादीधारी आचार्य महराज की जय ! अस्थान के महन्त मण्डलेश्वर की जय ! सन्त –पुजारी की जय! दाता भण्डारी की जय! अपने-अपने गुरू महाराज की जय!जोर से जयकारा लगाते  बाबा ने भोग लगाया
                तन्दरुस्त बदन, उम्र लगभग चालीस बरस, कन्धों तक फैले खिचडी जटा-जूट, उन्नत ललाट है  बाबा ओमदास  का उन्होंने कण्ठ, माथे और भुजा इत्यादि पर बारह तिलक  लगाए हुए है ,   कमर में केले के पत्ते  का अडिया और उसी का कोपीन धारण कर रखी है। सांसारिक प्राणियों के बीच यात्रा में रहने से  इस समय कमर में रेशमी वस्त्र  लपेटा हुआ है, नहीं तो फक्कड बैरागी काहे की लाज और काहे की शरम !   अस्थान में तो सब साधू  यों ही  हर  हर  हर घूमते रहते है ।
                सामने मिठाई का दौना है जिसमें से परसादी पाने लगे हैं । दो-चार ग्रास पेट में पँहचे तो चैन हुआ। पेट की अगन कुछ सिराने लगी । दो दिन गुजर गए, उस अस्थान पर पंगति में बैठकर भेाजन पाया था। बस तब के क्षण हैं और आज की ढलती साँझ, वे भोजन से भेले’  नहीं हुए । जाने कौन  मनहूस का मुँह देखा है,या कौन बख्त मुँह से उलट-सुलट निकला , सेा  अन्न देवता के दरसन-परसन को तरस रहे हैं ।
                हालाँकि साधुशाही रिवाज के मुताबिक तो वे उलट-सुलट ही बोले थे,लेकिन ओमदास बाबा उसे गलत नहीं मानते। वो तो स बात थी । अरे भाई ,साधु-बैरागियों का  देह-वासना से क्या लेना -देना ? ये भी  मिट्टी , वो भी  मिट्टी,  हर तन  मिट्टी !
                 ये तो दुर्जन के काम हैं , तो शास्त्रों में कहा गया -दुर्जनं दूरतः परिहरेत। अब दूर से ही त्याग आए हैं वे दुर्जनों को ,बल्कि उस समाज के सब जनों को। अघा गए वे उन सारे रीति-रिवाजों और प्रदर्शनों से ।
                सामने की मिठाई उदरस्थ हो चुकी थी, लेकिन बाबा का मन छूट-छूटकर मालवा की सस्य-श्यामला धरती में बने महन्त किरपादास के आश्रम में जा पहुँचता था और वे मन को खींचकर पटरियों पर दौड रही इस रेल  में वापस लाने का यत्न कर रहे थे।इसी खींचतान में आँखों के आगे फिर से तैर उठा था-महन्त किरपादास के अस्थान पर बीता समय।
                पिछले कुम्भ में प्रयागराज में ओमदास की भेंट किरपादास से हुई थी कुछ सत्संग भी हुआ था। दोनों ने साथ-साथ पंचाग्नि तपी थी और भभूत मलकर गंगा माई के तट तक भी साथ-साथ गए थे। तब के क्षणों में किरपादास बोले थे-सन्तजी ,हमने भी कुछ भगत जगत चेताए हैं । मालवा में एक अच्छा अस्थान बनवा दिए हैं । ठाकुरजी की सेवा-टहल और साधु सेवा होती है। कभी फुरसत में आइएगा अस्थान पर। कुछ दिन सतसंग होगा।
                रमते जोगी और बहते पानी का क्या ठिकाना । बाबा ओमदास वह न्यौता भूल गए और छः वर्ष बीत गए।
                तब वे एक जमात के साथ जातरा पर निकले थे । विंध्याचल की घाटी में बने एक स्थान पर जमात कुछ दिन रुकी और वहीं किरपादास के स्थान की चर्चा चली तो बाबा ओमदास को कुम्भ याद आया,  । झोली में से पुस्तक निकालकर उस पर लिखा बाबा किरपादास के स्थान का पता देखा। जमात के महन्त से जाने की अनुमति लेकर बाबा बिदा हुए ।
                महन्त किरपादास का स्थान खूब लम्बा चौडा था मन्दिर में ऊँचे-ऊँचे शिखर दूर से ही दिखते थे । अस्थान पर हमेशा चहल-पहल बनी रहती थी । महन्त जंगल में मंगल कर दिया था।   
                काँधे पर आसन बाँधे और हाथ में चिमटा कमण्डल लिए बाबा ओमदास ने दूर से ही हाँक लगाई -दण्डवत..त.!
                ”दण्डवतsssssssss..त..अस्थान किसी साधु ने जबाब दिया था और वे प्रसन्न होकर आगे बढ़  गए थे ।
                वे सीधे महन्त की गद्दी पर पहुंचे  । किरपादास उन्हें नहीं पहचान पाए थे और अजनबी  महात्मा को अजब निगाहों से ताक रहे थे। ओमदास ने देखा था कि छह बरसों  में महन्त किरपादास का हुलिया बिल्कुल बदल गया था। बदन चिकना हो गया था और खूब लम्बी तोंद भी निकल आई थी, उनके  जटाजूट अब पंचकेश में बदल गए थे तिलक भी बडे करीने से लगाने लगे थे।
                धरती पर तीन बार लेटकर ओमदास ने गद्दी की दण्डवत की और जतन से धरा एक रुपया झोली से निकालकर महन्त जी के चरणों में भंेट अर्पण की ।
                ”कहाँ से आना हुआ संन्त जी का?“ महन्त किरपादास की आवाज में एक रूखापन  था ।
                ”एक जमात के संग-तीरथ-जातरा करके लौट रहे थे कि आपके स्थान पर आने की इच्छा जागरत हुई ,सो दरसन-परसन करने हाजिर हो गये हैं ।
                कहकर बाबा ओमदास ने सोचा कि स्मरण दिलाऊँ-अभी छःवरस पहले ही तो हम दोनों प्रयागराज में कुम्भ के अवसर पर गंगा-तट पर भेंट  कर चुके हैं,  आपके न्यौते पर  अपने राम  आये और बुला के  पूछते  हो  कि...... । फिर  सोचा कि  छोड़ो साधुशाही की परम्परा और टकसाली विधान के अनुसार परिचय के पहले कुछ कहना नियम के प्रतिकूल है , यह समझकर वह चुप ही रहे ।
                ”सन्तजी का नाम और अखाडा द्वारा कौन  सा है?“
                ”संसार परब्रह्म परमात्मा का , सम्प्रदाय गादी महाराज का,  आशीर्वाद गुरू महाराज का,  साधु-समाज और आप सबका दिया हुआ मेरा नाम श्री ओमदास है। एक पल को  रुक वे अपना  गुरु स्थान  बखान  उठे -
                ”आदि आचार्य महाराज के सम्प्रदाय में दादा गुरू एक हजार आठ  श्री श्री गंगादास जी महाराज के शिष्य  श्री श्री एक सौ आठ श्री प्रयागदास महाराज ही हमारे गुरू महाराज हैं ।अखाड़ा द्वारा राजस्थान है-महाराज ।
                ठीक से उत्तर  पाकर महन्त ने समझ लिया साधू टकसाली है,खडिया  नहीं है । उनके चेहरे पर सन्तोष झलका। बोले -ठीक है सन्तजी, सन्त-निवास में आसन जमाइए,पारखत मले हो रहे हैं । आप भी कुआँ पर जाकर असनान बना लीजिए, दर्शन कीजिए और पंगति पाइए। बाबा ने माथा झुकाकर सम्मति प्रकट की और अस्थान के पिछले हिस्से में बने सन्त-निवास की और चल दिए। अस्थान सचमुच बडा सुन्दर था। चारों ओर से पेडों से घिरा हुआ था। बस्ती से तीन मील से भी दूरी के एकान्त मन्दिर होने से फालतू की चें-चें,पैं-पैं से मुक्ति थी यहाँ। भजन करने के लिए एकदम उम्दा अस्थान थे ।
                मन्दिर के पीछे भण्डारग्रह था और उसी से लगी हुई गौ शाला । औमदास का मन प्रसन्न हेा उठा यानि कि अस्थान पर गौ सेवा भी होती है। सन्त-निवास देखकर तो तबियत टन्न हो उठी । स्सफ  सुथारा ,लिपा पुता , जालीदार  दरवाजा, मच्छर  की  टिकिया से महकता खूब लंबा कमरा था, कितने  सारे तख्त और  चबूतरे  थे वहां ! कई साधु सन्त-निवास में विश्राम कर रहे थे ।
                एक चट्टी पर आसन जमाकर उन्होंने कमण्डल लिया और  चांपा कल पर चले गए । खूब मल-मलकर असनान बनाए ।
                कोंपीन बदली और अपना दैनिक पाठ करते हुए ही वे भीतर मन्दिर में पहुँचे। आहा! क्या खबसूरत चिन्ह पधराए हैं । बस देखते ही रहो ।प्रणाम करके परिक्रमा में गए तो कोने में खुलटा हुआ   
एक दरवाजा दिखा।
                कौतुहल से भीतर झाँका तो हृदय गदगद हो गया । एक बूढे साधु को घेरे दस-बारह बालक दास बैठे थे । बूढे बाबा उन सबको सिद्धन्त पटल ठाकुर टहल बता रहे थे । श्रद्धाभिभूत होकर बाबा ओमदास ने बूढे बाबा को दण्डवत की ।
सच्चे टकसाली साधु को सिद्धान्त पटल और ठाकुर टहल तो रटे हुए होना चाहिए ।उनकी यह धारणा और अधिक पुष्ट हो गई । ओमदास बूढ बाबा के निकट पहुँचे तो सारे नए चेलों ने ओमदास को एक स्वर में दण्डवत की।
                बूढे बाबा ने ओमदास के अखाडा और द्वारा जानकर सन्तोश प्रकट किया फिर एकाएक पूछ बैठे-सन्त जी ,जानते हो ,माथे में कितने बाल हैं।
                ”बाल तो दो ही हैं बूढ बाबा,एक सफेद और दूसरा काला ।
                ”और लंगोटी में कितने धागे हैं ओमदास ?“
                ”लंगोटी में भी दो ही धागे हैं एक आड़ा और दूसरा ठाड़ा ।
                ”इस दुनिया में सबसे बडे यात्री कौन है सन्त जी?“
                ”सूरज और चन्दा से बढकर दूजा कौन बडा यात्री होगा,महाराज ।
                ”मानुस  जैानि के करम का सबसे बडा रखवाला कौन है महात्माजी?“
                ”दो नेत्र और आत्मा ही सबसे बडा रखवाले हैं बूढ़े  बाबा।
                सारे  उत्तर  बिना संकोच और हिचकिचाहट के मिले तो बूढ़े महात्मा के चेहरे पर संतोष के भाव आए । उन्होंने ओमदास से कुशल-क्षेम पूछी ।ओमदास उठे और बाकी परिक्रमा पूरी करने लगे ।
                परिक्रमा पूरी करके फिर वे निज मन्दिर के सामने आ पहुँचे । वहाँ साष्टांग  प्रणाम कर जब वे भण्डारघर में घुसे तो भूख से पेट में कुलबुलाहट होने लगी थी। भण्डार में पंगति की तैयारी हो रही थी ।
                फिर तो उनके चार दिन चुटकी बजाते ही बीत गए।  प्रातः सूर्योदय के पूर्व ही असनान बनाते । दोपहर एक ओर चले जाते और पाँच स्थान पर अग्नि जलाकर पंचाग्नि तापने बैठ जाते । दोपहर -ढले वहाँ से उठते, तब जाकर परसादी पाते । इस नए        अस्थान पर उन्हें खूब आनन्द आया।
                बस किरपादास की दिनचर्या उनकी समझ में नहीं आई ।  और सब साधु जहाँ ब्रह्म-मुहूर्त में जग जाते वहीं महन्त किरपादास तो श्रंगार -आरती के कुछ देर पहले ही जागते हैं और जल्दी -जल्दी अपने प्रातः क्रिया कर्म से निवृ हो लेते हैं । फिर एक बार गादी पर जमे तो सीधे पंगत में उठते हैं । दोपहर में विश्राम करके तीसरे पहर भी वे सीधे उठकर गादी में पसर जाते हैं वहीं लेटे-बैठे हुकुम देते रहते और चपाटी दौडकर टहल पूरी करते रहते। शाम को किरपादास नेताओं से धिरे बैठे रहते हैं । छिः छिः! आजकल साधु भी राजनीति की वेश्या पर रीझने लगे हैं न।
                यों तो किरपादास की उम्र ज्यादा नहीं है । वे भी ओमदास की ही उम्र के हैं लेकिन दोनों में कितना अन्तर है। इधर तो बाबा ओमदास गुरू कृपा से ब्रह्ममुहूर्त में ही जग जाते हैं और सूर्योदय तक अपने नेम-धर्म से निवृ हो लेते हैं ।उधर बडे आलसी हैं बहुत ममतालु हैं ,किरपादास अपनी गादी के लिए। नेम-धर्म के लिए तो समय ही नहीं उनके पास। गुसाई महाराज सच कह गए हैं जाके  नख और जटा विसाला,सोई तापस प्रसिद्ध कलिकाला ।
                साधना तो नागा साधुओं की जाकर देखो वसन और वासना से दूर रहकर कैसे वे अपने शरीर को तपा-तपाकर कंचन बना लेते हैं । कुम्भ में और सम्प्रदायों के लोग भी आए थे । रामानन्द सम्प्रदाय ,रामानुज सम्प्रदाय,निम्बाकाचार्य, एक-से-एक तपेश्वरी साधु ।हर सम्प्रदाय के साधु सच्चे ब्रतधारी और पूरे बैरागी! पर ओमदास को खुद के सम्प्रदाय में सब बावन गज के लगते हैं ।
                उठकर खिडकी से झाँका, तो विस्मय हुआ। महन्त किरपादास बाहर खडे थे ,कमर में केवल कोपीन था शेश सारा वदन उघारा था। सामने एक नया चेला था। गोरा चिकना -सा,चेला भी नंगे वदन केवल कोपीन लगाए था।महन्त के कमरे के आगे खडे दोनों हँस-हँसकर बतिया रहे थे।
                ...च्च...च्च...च्च। तो बडी गलती बात है। अभद्र तरीका है।ऐसे भी खड़ा  हुआ जाता है। वे बुदबुदाए।
                विचार आया कि सन्त -निवास से बाहर निकलकर उधर ही जा पहँचें पर दूसरे  पल ही सोचा कि अपने को क्या करना ,अपनी करनी पार उतरनी ।लेकिन उनका मन कब इस जुमले को स्वीकार करता है !अगर ऐसा होता तो उस विसरामपुर वाले अस्थान की बदनामी न होने देते । हालाँकि गुरू महाराज कहते थे , ”ओमदास तुम्हें तो कहावत सारी के पाँव पकडकर बैठ गए। भले आदमी ऐसी बातें तेा कायर सोचते हैं । आलसियों के विचार हैं जो तो ।े
                पर वे आलसी नहीं हैं ।बचपन से मेहनत की है उन्होंने ।सोलह साल उमर से हल हाँका है। पस्टार फेरी है। दावन-उडावनी की है और पन्द्रह कुण्टल के गल्ले से लदे पाल की गाडी  के धुरारिया बनके मण्डी तक ले गए हैं ।
                बूढे होते पिताजी ने बडे भाई को पहले ही पढाई छुडा दी थी और आठवाँ दरजा चढते-चढते उन्हें भी खेत का रास्ता दिखा दिया तेा वे भी कान से ऊँची लोहांगी लेकर खेत -टगर में भटकने लगे थे। खेती के सारे काम बडे सुघड तरीके से सँभाल लिए उन्होंने ।
                उन्हीं दिनों कोई सगया आए थे, उनकी सगाई लेकर । पिताजी ने सगयों को  निर्विकार  भाव से कुल-परम्परा सुना दी थी कि उनके खानदान में मँझला लडका कुँआरा रहता है ,इसलिए ओमसिंह की तो शादी होनी नहीं है । ओम से छोटे की करने तैयार हैं। तब ओम से छोट पप्पू दूल्हा बन गए थे और ओमसिंह की भीतरी दुनिया सूरीसूनी हो गई थी । उनके मन में उठती श्रंगारिक भावनाएँ सीधे रास्ते के बजाय गली -छेडी तलाशने लगी थीं ।
                घर वालों पर बेहद खपा थे वे ।मन-ही-मन में योजना जरूर बनात रहते थे कि कोई लडकी बस पट जाए उनसे । चाहे किसी भी बिरादरी ही क्यों न हो, लेकर ही भाग जाएँगे । गुर्राते रहें घर वाले-अपनी करनी पार उतरनी ।खेती किसानी के काम से उन्हें प्रायःबूढे पुरानेां में बैठना पडता था और धीरे-धीरे भजन गाने का शोक होने लगा था। गाँव की रामलीला में वे भक्तों के पार्ट करने मेेें सिद्ध-हस्त होने लगे थे और फिर आदतन वे दुनियादारी से वैराग्य की बातें सोचने लगे । बोलने लगे धरम-करम की बाते और विशय-वासना की बुराई करते -करते वे आए वैरागी हो सके । आसपास कहीं जग्य होता ,कोई प्रवचन होते, ओमसिंह का डेरा कई-कई दिनों के लिए वहीं जम जाता । वे खूब सतसंग करते ।किसी साधु जमात का आना होता तो वे विस्मृत से होकर साधु-सेवा में जुट जाते। साधुओं से देश-परदेश की बडे ध्यान से सुनते । गाँव की चौहद्दी में हमेशा फिर रहा उनका मन , चौहद्दी तोडकर बाहर आने को उत्सुक हो उठता। उनका वेश भी धीरे -धीरे साधुओं का हो गया । केशरिया कपडे और अस्त-व्यस्त दाडी बाल तथा रंग -बिरंगे टीका छापे लगाने लगते । खेती सूखे या आग लगे उन्होंने चिन्ता करना छोड दिया । बल्कि जो भी हाथ में पडता है वे दान-पुण्य करने से न चूकते।
                एक बार बडे ने उन्हें टोका कि अच्छे -खासे किसान होने के बाबजूद काहे के लिए पराश्रितों की तरह साधु भिखमंगे बने फिरते हैं । पप्पू ने भी बडे का समर्थन किया तो उनका मन बिल्कुल खिन्न हो गया । वे खेती बाडी के काम से कतई दूर रहने लगे । घर में उनकी हेंसियत गैरजरूरी जीव की तरह हो गई थी । ज्यों-ज्यों घर से उनका मन दूर होता गया,भजन-पूजा में उन्हें आनन्द आता गया । उन्हें यह दुनिया स्वार्थी और विशयी लगने लगी थी ऐसा ही झगडा चलते एक दफा वे सन्न रह गए, जब उन्हें भाइयों ने पागल करार दे दिया और एक अखवार में छपा भी दिया ।इच्छा तो हुई कि इस अन्याय का जमकर प्रतिकार करें लेकिन मन में बस गए वैराग्य ने उन्हें रोक दिया।
                उन्हीं दिनों एक साधु जमात के साथ वे घर छोडकर भाग निकले थे ।बिसरामपुरा का अस्थान उनका पहला गाँव था। जमात ने उन्हें वहाँ छोडा और आग निकल गई । जमात के महन्त ने स्पश्ट कहा था कि वे टकसाली साधु नहीं बने हैं ,खडिया ही हैं। ,क्योंकि न उन्हें सिद्धान्त पट ल को ज्ञान है न ठाकुर टहल का निगुरे तो हैं ही।
                उन दिनों बिसरामपुर की गद्दी पर महन्त किशोरदास थे । अस्थान पर जनता की भारी भीड इकट्ठा होती थी ।संजा-आरती में एक डेढ सौ भगत हर मौसम में मौजूद रहते ।हाँ अस्थान पर साधु-सन्यासी कम रहते थे ।महन्त एक दिन से किसी को ज्यादा टिकने ही नहीं देते थे । ओमसिंह को पाकर किशोरदास ने सोचा कि इस हट्टे-कट्टे आदमी को चेला मूढ लो ,अच्छा सेवा टहल करेगा। उन्हें अस्थान पर रुकने के लिए अनुमति दे दी थी
                बिसरामपुर का यह स्थान बस्ती से पाँच किलोमीटर दूर था और बीच रास्ते में थोडा जंगल पडता था ।साधुओं और जमातों का आना जाना कम ही था ।इसलिए यहाँ साधुशाही रिवाजो ं की फिकर कोई नहीं करता था। महन्त ने एक औरत रख छोडी थी ,जो प्रगट में तो अस्थान पर गोबर समेटने का काम करती थी ,लेकिन ओमसिंह ने उसे कई दफा रात-विरातजब महन्त के कमरे से निकलते देखा तेा नफरत से भर गए थे।एक रात तो जीप में आठ-दस बन्दूकधारी  आए थे, किशोरदास से मिलने। तब ओमसिंह वहाँ की गडबडशाला में उलझ ही गए थे-ये क्या ?

                उस दिन बिल्कुल सुबह के केले के पत्ते  की कोपीन बनाने के लिए जब फुलवारी में किशोरदास मौजूद था। उसने वहीं से पुकार कर कहा था -इधर मत आना भाई । आना निशेध है । विस्मित ओमसिंह ने सोचा था कि बगिया में एसी कोई चीज होगी , जिसे टकसाली साधु ही छू पाते हैं ।वे चुपचाप लौटकर अपनी नित्यक्रिया में लग गए थे।
                वह रहस्य तीन दिन बाद खुला था , जब पुलिस ने पूरा अस्थान घेर लिया था। तलाशी हुई थी और बगिया में गांजे के पचास पौधे मिले थे ,तो उनका माथा ठनका था ।देखने वाले तो हक्के-बक्के रह गए थे ,जब किशोर के कमरे से पुलिस ने पुरानी मूर्तियों का जखीरा बरामद किया था। पुलिस महन्त किशोरदास को गिरफ्तार करके ले गई थी और ओमसिंह बडबडा उठे थे-पहले कोर में मछली ब्यानी ,छोडो भोजन बोले ज्ञानी ।
                अस्थान के और साधुओं को भी पुलिस ने परेशान करना चाहा लेकिन शहर के एक-दो प्रभावशाली भक्तों के हस्तक्षेप से मामला दब गया था और मात्र किशोरदास को अपने पास रखकर मुकदमा चलाया था।
                उस दिन भी उन्हें लगा था कि उल्टे पैरों गाँव लौट जाँए,पर गाँव की परिस्थिति तोऔर ज्यादा असहनीय थी न,सो मन मसोसकर रह गए थे । आसपास के तमाम वैरागी इकट्ठा हुए और किशोरदास को निश्कासित कर दिया गया ।फिर मंगलदास जी को महन्ताई सोंपी गई थी।तब वे नहीं थे ।मंगलदास जी के गुरूभाई प्रयागदास जी महाराज से ओमसिंह का परिचय नहीं हुआ था सीधे-सच्चे तपस्वी सन्त प्रयागदास जी महाराज ज्ञान का अदभुत भण्डार थे। ओमसिंह ने उन्हीं की सेवा आरम्भ कर दी थी। साधु समाज से उठ गई उनकी श्रद्धा प्रयागदास जी के कारण दुबारा जागी थी।
                एक दिन झिझकते हुए ओमसिंह ने चेला बनने की इच्छा व्यक्त की तो प्रयागदास जी टहलते रहे, बाद में बेमन से उन्होंने हामी भरी थी । फिर एक दिन सिद्धान्त पटल में बताई प्रक्रिया से उन्हें शिश्य बनाया गया , अर्थात दक्षकर्ण वदेमन्त्र गिवारं पूर्णमानसः। मन्त्रार्थ मन्त्र बीज वेतराड भित स्वर फला दिवम।
                सबसे पहले उन्हें आसन जमाना सिखाया । आसन रखते समय वे मन्त्र बोलते -ओम भूरभुवः स्वःकूर्माय नमः।
                पृथ्वी की प्रार्थना करते समय उन्होंने मन्त्र रटा- ओम पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं श्णिुना धृता। त्वं व धारण्य मां देवि पवित्रं कुरू चासनम।
                हर क्रिया का मन्त्र उन्होंने सौ-सौ बार रटा तब याद हुआ। उन्हें सिद्धान्त पटल और ठाकुर टहल रोज सबेरे गुरूजी खुद रटाते । सुबह से शाम तक की सारी क्रियाएँ वे बडे मनोयोग से करते बल्कि इतने मनोयोग से करते कि साधु बनने के मूल उद्देश्य का कर्म भी उतने मनोयोग से न कर पाते ।
                गुरूजी ने ओमदास नाम दिया। वेश समझाया ,कमण्डल का आकार ,कोपीन का तरीका ,तिलक -छापों का रहस्य सब कुछ बच्चे की तरह समझाया । साधु और खडिया साधु के गुप्त  भेद भी दिखाए ।
                मंगलदास जी महन्त बने तो बिसरामपुरा अस्थान के रंग-ढंग ही बदल गए। वहाँ न कोई नशेलची रहा न पाखण्डी। हर चीज में साधुशाही का ख्याल रखा जाने लगा । हर प्रक्रिया बारीकी से देखी-परखी जाने लगी ।एक घटना तो उन्हें आज भी याद है ।कैसा मनोरंजन नजारा पैदा हुआ था वहाँ। खाने-पीने में खास चीजों का विशेश ख्याल रखने वाले उस अस्थान पर एक साधु छुपकर लंका मिर्च और बन लडडू (प्याज) खाता पकडा गया तो पंचायत इकट्ठी हुई थी और पंचायत ने उस साधु के लिए पंचायती मार का दण्ड तजवीज किया था। फिर कम्बल उडाकर साधु की एसी पिटाई हुई थी कि तीसरे दिन वह साधु भाग निकला था और बाकी साधु उस पर हँस उठे थे ।
                गुरूजी के साथ ओमदास यात्रा पर निकले थे। उन्हें याद है कि फूलपाटे का अस्थान उन्हें रात में छोड देना पडा था। क्यों कि वहाँ महन्ताई को लेकर पुजारियों में चल रही लट्ठमार लडाई रात को अचानक ही रक्त-रंिजत हो उठी थंी ।कई जगह इस घटना का उन्होंने जिक्र किया था । जिक्र तो उन्होंने सिंह वासे के अस्थान का भी कई जगह किया था जहाँ कि गुरू-चेला के बीच (दानमें मिले)कम्बल को लेकर झगडा हो उठा था। साधु संसार का मजा लेते वे बहुत दिनों तक घूमते रहे थे ।
                ”बाबा अपना टिकट दिखाइए!टिकट चेकर ने बाबा ओमदास का मन को मंगलदास जी के अस्थान से खींचकर भागती ट्रेन में ला पटका था ।
                मिठाई का खाली दोना जस-का-तस रखा था। ओमदास ने उठाकर खिडकी से बाहर फेंका व कमण्डल के जल से हाथ अमनिया किया । काँधे की झोली से अपना टिकट निकालकर उन्होंने चेकर को दिया और ठीक से बैठ गए।
                टिकट पर निशान लगा कर चेकर आगे बढ गया तो ओमदास ने टिकट पुनः झोली मंे रखा और बाहर झाकने लगे ।
                दूर कोई गाँव दिख रहा था। गाँव से हटकर एक अस्थान भी नजर आ रहा था । अस्थान के ऊँचे झण्डे निशान और शिखरों के कलश यहीं से नजर आ रहे थे। बाबा किरपादास के अस्थान पर सन्त-निवास में उस दिन वे दोपहर को लेटे हुए थे और अचानक वह निशाधारी हँसी गूँजी थी । फिर महन्त और उनका नया चेला एकाएक गायब हो गए थे ।अकुलाए से ओमदास बाहर आ गए थे और महन्त का कमरा अन्दर से बन्द देखकर उधर ही बढ लिए थे ।
                दरवाजे की झिरी में से उन्होंने देखा आज याद करते भी लाज आती है और उनका चेहरा इस समय भी तन आता है ।
                वे तुरन्त लौटे थे और अपना आसन बाँधने लगे थे ।
                अस्थान छोडकर आते समय वे महन्त के दरवाजे पर रुके थे उसे जी भर गलियाते रहे थे ।महन्त भीतर चुप बैठा उनकी गालियाँ सुनता रहा था। क्रोध मे खदबदाते ओमदास वहाँ से पैदल चले तो रुके नहीं थे । लगातार चलते रहे थे । जब खूब थक गए तो एक पेड का आसरा ढूँढ उसी के नीचे रात को लेट गए थे । नींद किसे आनी थी । सारी रात करवट बदलते रहे ।सुबह उठकर अनमने ढगं से नेम-कर्म निपटाया और फिर चल पडे थे निकट के रेलवे स्टेशन की तरफ जहाँ कि कल रात बारह बजे पहुँच  सके वे ।
                ये दो दिन बडे उहापोह में बीते हैं ।घिन सी होने लगी है उन्हें अपने वेष पर। इसी
वेष पर रीझ उठै थे वे ।क्या मिला उन्हें । घर छूटा ,गाँव छूटा ,भाइयों से अलहदा हुए,बुराई
भी हुई । जीवन भर का हक मारा गया । आज पराश्रित होकर रह गए हैं ।
                साधुओं को देवता समझते थे वे ,पर आज जाना कि वे तो पूरा आदमी भी नहीं हैं
अरे संसार के सिरजनहार ने संसार में मर्द के साथ औरत बनाई है तो इसका केाई मतलब
ही होगा ।औरत के बिना आदमी अपूर्ण ही रहता है। आखिर कहाँ ले जाऐगा आदमी अपना
शरीर ,अथवा मन।शरीर भी कुछ चाहता है और मन भीं। कब तक दबाओगे इसे ?और ज्यादा
दबाओगे तो रोग-बीमारी ही फैलेगी । नहीं तो फिर उल्टे-सीधे साधन अपनाने पडेंगे जैसे
ओमदास शुरू से अपनाते रहे गाँव में या फिर किशोरदास और किरपादास ने किया।
                साधु बनकर जितनी तन्मयता से उन्होंने क्रिया-कर्म किए उतना तो कभी भजन भी
नहीं कर सके। मंजिल की तरफ ध्यान कहाँ रहा उनका , वे तो रास्ते मंे ही उलझे रह गए।
मेहनत से दूर होते गए तो शरीर भी आलसी होता गया। हर चीज अपनी कुब्बत से लेना तो
भूल चुके वे । माँग -मूँग कर पेट भरना अपनी नियत बना ली उन्होंने।
                इन दिनों तो उन्हीं लोगों की चलती हो गई है जो हर जगह अपने वेश का लाभ
लेते रहे। अब तेा हर साधु नेता बनना सीख रहा है।जिसे देखो वो राजनीति करने अयाध्या
जा रहा है। जैसी धन-सम्पत्ति  साधुओं के पास देखी वैसी तो किसी गृहस्थ-सेठ के पास भी न
होगी। ऐसे वैरागियों के बारे में गुसाई जी महाराज कह गए हैं-
                 ”तपसह  धनवंत दरिद्र ग्रही।
                  कलि कौतुक तात न जात कही।।
                ओमदास के गुरूजी इन चीजों से बहुत मुक्त थे। न किसी अस्थान की चाह रही उनमें
,न कोई धन-सम्पत्ति  जुटाई उन्होंने ।मंगलदास जी ने बहुत यत्न किए कि वे स्थायी बनकर रहें
व गल्ला-मण्डी से दान में मिलते गल्ले का हिसाब-किताब वे खुद रखें ताकि मन्दिर -निर्माण
के सही खर्चे लोंगो को बता सकें पर गुरूजी इतना ही बोले थे किसाधु का जमीन-जायदाद
से क्या लेना देना।उसे तो अपना सुधार करना चाहिए। गोल बाध्ँाने से क्या होता है,अरे,भजन
करना है तो अकेले जुटो।वे रस्सा तुडाकर भाग निकले हैं।
                वे लगातार सोचते रहे हैं कि अब कहाँ जाँए ।इस साधु समाज से तो उनका गले-गले
तक मन भर गया है इसलिए किसी अस्थान पर जाने का तो कभी नहीं सोच सकते। हाँ,गाँव
के बारे में विचार किया जा सकता है..पर..गाँव में कोन है उनका ..दानों भाई तो नाता तोड तोड ही गए हैं उनसे, और माता -पिता अब जीते नहीं हैं । हाँ यार दोस्त बहुतेरे हैं ,उन्हें चाहते भी थे वे लोग। फिर जननी जन्म भूमि तो सबकी प्यारी होती है न।
                लेकिन लौटकर क्या अपने गाँव में फिर से खप सकेंगे वे। गृहस्थों की दुनिय दुबारा
कैसे घुल मिल सकेगें जिसे काफी दिन पहले बुरी मानकर छोड आए थे वे। गाँव में से वे बुराइयाँ तो खत्म हो नहीं गईं होंगी,जो उस समय प्रचलित थीं ।..तोे..क्या साधु समाज में ही
बने रहें?वे सचमुच बडी कसमकस में फस गए है।-भई गति साँप छछूँदर केरी ।
                बडे सोच-विचार के बाद उन्होंने तय किया है कि वे गाँव लौट जाएँगे। तपस्या ही करनी है तो गाँव में करंेगे। लोगों को जगाएँगे,यह भी एक तपस्या है।
                अपनी जमीन के लिए हक्क के लिए जूझेंगे,लडेगे ।हक पाकर कडी मेहनत से खेती
करेंगे ।
                और..और अगर कोई मिली तो ब्याह भी कर लेंगे खुले आम ।इसमें कैसा संकोच !संकोच और लाज तब हो जब चोरी-छिपे कुछ किया जाए ।इसी दुराव-छिपाव के भाव को ही तो पाप कहतें हैं न।
                अपना वेश उन्होंने इसीलिए नहीं उतारा है कि अब गाँव जाकर ही वेश का अन्तिम
संसकार करेंगे।यही सोचकर वे इस ट्रेन में बैठ गए हैं जो उन्हें गाँव ले जा रही है।
                साझँ हो चुकी थी।खिडकी से सर्द हवा आ रही थी ।उन्होंने खिडकी के बाहर नजर डाली ।गाडी किसी नदी से गुजर रही थी। किनारे पर बने किसी अस्थान में जगमगाते बिजली के बल्व यहाँ तक दिख रहे थे।उन्होंने झुँझलाकर खिडकी की शटर गिरा दी ।
                अस्थान उनकी आँखों से ओझल हो गया।

००००० 

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

राजनारायण बोहरे की एक और कहानी







डूबते जल यान
                चूल्हे में लगी लकडी बहुत धुधुआ रही थी । सिलेण्डर कोने में लुडका पडा था ,शहर में गेस सिलेण्डर पन्द्रह दिन में नम्बर आता है  तब तक मिट्टी के चूल्हे और लकडी - कण्डा से जूझती रहेगी वह ।        
                खुल्ल खुल्ल खुल्ल !
      बाहर के कमरे से फिर खॅासने की आवाज आई है ।! अब्बल दर्जे के जिद्दी हैं बीडी को नहीं छोडेगें , और जब तकलीफ  भोगेंगे , तो खुद के अलावा  दुसरों को भी कश्ट पहुचाएगे । बाबूजी लकवे के शिकार हैं जब खॅासी चलती है तो दिवा ही कन्धेां से पकडकर उठाती है ओैर सीने को सहलाती है तभी ।  
                बाबूजी के अलावा दिवा को बाजार का काम भी देखना होता है सास जिन्दा होती तो कुछ हाथ बॅटाती लेकिन तीन वर्श पहले वे सुहागिन बनी , सजी -धजी, मॉग भर सिन्दूर , हाथ भर चूडी और पॉवो में तीन तीन बिछिया पहने स्वर्ग सिधारीं हैं । घर में दिवा अकेली है । उसका पति बिपिन छŸाीसगढ में डाक्टर हैं । कभी कभार महीने दो महीने में उसे छुट्टी मिलती है तो आ पाता है । यूॅ विपिन के बडे भाई नवीन यहीं है इसी शहर में नहर विभाग के दफ्तर में यू़ डी सी  है । अच्छी खासी कमाई है । चाहें तो बाबूजी ओर रश्मि को अपने साथ रख सकते हैं , लेकिन उन्हें तो सगों में सडाँध आती है । विपिन अपना कोर्स पूरा कर रहा था उन दिनों नवीन की पत्नी रूपा के माध्यम से आया रिस्ता, किसी कारणवश बाबूजी ने नहीं स्वीकारा तो नवीन भाई चिडकर अलग हो गये थे , । जैसे तैसे करके विपिन  ने डिग्री हासिल की फिर उसने कई जगह इन्टरव्यू दिये थे । छŸाीसगढ के धुर जंगली इलाके की पोस्टिंग मिलने पर चिन्तित हुए, एक बार वह नवीन के यहॉ भी गया , और अपनी अनुपस्थिति में घर की फिक्र करने की बात कही , तो नवीन भाई, बाबूजी के प्रति अनाप-शनाप बोलने लगे थे । खिन्न मन से विपिन डयूटी पर चला गया था ।                                                                                        एक दिन टेलीग्राम मिलने पर वापस आया , तो पता चला कि बाबूजी पर फालिज गिरा है । बिल्कुल लुंज -पुजं होकर बाबूजी खटिया पर लेटे मिले थे । विपिन तो घबरा ही गया था आनन -फानन में इन्दोर ले जाकर विपिन ने बडे अस्पताल में इलाज आरम्भ किया था । दो महीने तक इलाज कराया और जब बाबूजी थोडा चलने -फिरने की स्थिति में हुए तो उसने नोकरी की सुध ली थी जबलपुर वाली दीदी व जीजाजी को जल्द-से -जल्द विपिन की शादी निपटाने की फिक्र लग गई थी । उन दिनों दिवा ने एम ए फाइनल दर्शनशास्त्र की परीक्षा दी थी ,और रिजल्ट का इन्तजार कर रही थी ,कि एक दिन विपिन और उसके दीदी- जीजाजी उसे देखने अचानक आ पहँचे  । दिवा तब शरीर और मन के तर्क -युद्व के बीच निरुपाय -सी बैठी थी ।                                         बिपिन ने उसे एक नजर देखा और तुरन्त ही पसन्द कर                 लिया । दिवा का मैान उसकी सहमति मान ली गई थी ।
                कितनी दफा याद आया है दिवा को अपना वह अन्तर्द्वन्द्व । स्म्रति की जिस गली से होकर विपिन से उसकी शादी की बात याद आती है, उसके ही पास की गली में बैठा कोई और जैसे उस अन्तर्द्वन्द्व को कौंच कौंच कर जगाता है ।
वह यन्त्रवत सब कुछ करती रही थी शादी में जब लोग इकट्ठे हुए । दिवा ने अभी तक पिता का लाड देखा था और देखी थी अपने मन के महत्वाकांक्षी परिन्दे की असीम उडान । यूनिवर्सिटी की क्रिकेट टीम में वह विकेट कीपर के रूप में शामिल रहती थी और इसी कारण उसने प्रदेश ही नहीं देश के कई शहर अपनी टीम के साथ घूम लिए थे।  ससुराल पहुँच कर वह एकाएक घबरा ही गई ,क्यों कि एक देहाती घर था वह । अपने डैडी के नौकर -चाकरों से भरे घर में उसे कभी एक गिलास पानी भी अपने हाथ से नहीं पीना पडा था । जबकि यहॉ हर काम उसे खुद करना था, अपना भी  और परिजनों का भी । पहली रात देर तक रोती रही थी ।  शादी के चोथे दिन ही रसोई की राह दिखा दी गई जहॉ प्रविश्ट होते समय वह अपनी मम्मी की बेहताशा याद करती रही थी ,जिन्होंने स्त्रिीयोचित दूरगामी द्रश्टि से दिवा को कच्चा-पक्का खाना बनाना सिखा ही दिया था ।                                                               घर लोटकर वह अपने पूरे प्रयास के बाद भी चुप नहीं रह पाई थी । तडपकर उसने मम्मी से पूछा था क्यों नरक मे झोंक दिया उसे ? मम्मी विचलित हो उठीं थीं और डैडी भी भी उसके असंन्तोश से शान्त न रह सके थे डैडी आहिस्ता से बोले थे -देखो बेटा, आजकल  लडका सब देखते हैं । तुमको कितना रहना है उस घर में ? नोकरी पर रहना ही है तुम्हें । और बेटा जो होना था ,वह तो हो लिया । हम तो पराये हो गये तुम्हारे लिए ।संजीदा हो गये पिता की गोद में सिर छिपा लिया था दिवा ने ।       अगली दफा बाबूजी का आग्रह मानकर बिपिन असे छŸाीसगढ ले गया था । उस दफा जल्दी लोट आई थी दिवा । यहॉ सब कुछ ठीक-ठीक चलने लगा था। कि एक दिन अचानक अम्माजी की तबियत बिगड गई ओैर उन्हें अस्पताल ले जाना पडा था सीने में दर्द जान लेबा हो गया था । अस्पताल में ही  शरीर छूट गया । तार पाकर तीसरे दिन बिपिन आ पाया था माताजी की तेरही के बाद जिस दिन विपिन अपनी डियूटी पर लोटने की तैयारी कर रहा था उस दिन बाबूजी को सुबह से कुछ घबराहट होने लगी । सीने में दर्द और बेइंतहा गर्मी का अनुभव करते बाबूजी का चैक-अप जब खुद बिपिन ने किया तो पाया कि उन्हें हार्ट-अटेक हुआ है । स्थानीय अस्पताल में भर्ती करते-न- करते बाबूजी पर लकवे का दूसरा हमला हुआ । फिर तो विपिन प्राणपण से उनकी खिदमत में जुट पडा था टैक्सी करके वह फिर इन्दौर भागा था और बाबू जी को भर्ती करा दिया था ।
                इस बार सीबियर अटेक था ,इस वजह से डाक्टरों को भी ज्यादा उम्मीद न थी । बाबूजी  की प्राकृतिक चिकित्सा प्रारम्भ हुई थी । चुम्बक के पानी की मालिश होती , वही पानी उन्हें पिलाया जाता ।
                चमत्कार सा हुआ । बाबूजी अच्छे होने लगे । उनके हाथ- पॉव में हरकत शुरु हुई और मुँह से टूटे-फूटे स्वर निकलने लगे । अब जाकर सबने राहत की साँस ली थी । धीरे-  धीरे अपनी पुरानी हालत में लौटने लगे थे ।
                अचानक एक दिन अपने विभाग से विपिन को तार मिला । उसे तत्काल ज्वाइन करने  का आदेश दिया गया था । दिवा के जुम्मे सब कुछ छोडकर वह अपनी नोकरी पर भाग गया ।
                जब भी बिपिन आता वे दोनों अकेले में मिलने को तरस जाते । यदा-कदा ऐसा अवसर आता भी तो चिन्तित और व्यग्र बिपिन उससे उतावली में मिलता और उसी उतावली में पार हो जाता । वह क्षुव्ध हो उठती । हर बार की अतृप्ति अनबुझी प्यास, उसके मन में कुण्ठा बढा जाती ।
                दिवा चुपचाप उठी और किचन में घुस गई । उसने खना बनाया और बाबूजी को खिलाया , उसे अभी खाना नहीे खाना , क्योंकि आज गुरूवार का ब्रत हे उसका ।
                गुरूवार की याद आते ही उसकी स्मृति का दूसरा धडाक से खुल गया ।अरे बाप रे !आज तो दीपू आयेगा । उसे झटपट तैयार हो जाना चाहिए । नहीं तो उसे बागड बिल्लो बनी देख, जाने क्या-क्या सुनाने लग जाएगा । जहॉ का काम तहॉ छोडकर उसने बाल खोले और कघंी फेरने लगी ।
                दीपू! दीपू! दीपू!
                वह नाम उसके दिल-दिमाग में ताजगी भर देता है, पिछले कई वर्शौं से क्षण-क्षण । याद है उसे , दीपू से हुई मुलाकात । शादी के पहले की बात थी वह । दिवा को टायफाइड निकला था   दिवा की बडी दीदी श्ल्पिा उन्हीं दिनों मायके आई । शिल्पा के साथ एक अजनबी अल्हड-सा युवक भी था जो पूछने पर पता चला था कि वह था शिल्पा का देवर -दीपू! बाप रे! बचपन का वह दुबला पतला और शर्मीला दीपू अठारह-उन्नीस पार करते - करते कैसे खुबसूरत और जिन्दादिल युवक निकल आया था । दीपू ऊपर से  जितना मस्त और लापरवाह  भीतर से उतना ही भावुक और गम्भीर भी । कम  उम्र म में उसकी दृश्टी इतनी साफ और स्पश्ट थी , कि दिवा जैसी गम्भीर व पढाकू नव युवती उस के सामने नन्हीं बच्ची बनी टुकुर - टुकुर ताकती रहजाती ।
                हमेशा  दिवा को हँसाता - गुदगुदाता वह ढेर सारे चुटकुले छितराता रहता था  ।
                दीपू के आने के तीन दिन के भीतर उन दोनों में ऐसा लगाव हो गया कि एक-दूसरे से चुहल किये बिना उनका समय ही न कटता । पहली बार दिवा को अपनी रुचि का कोई मिला । वर्ल्ड -कप क्रिकेट से लेकर रणजी ट्रॉफी तक के खिलाड़ी और पॉप जॉर्ज संगीत से लेकर बुन्देलखंण्डी   लोक - संगीत तक नये से लेकर पुराने फैसन तक कोई भी तो एसा पक्ष न था, जिसको वह बारीकी से न जानता हो । शिल्पा ससुराल लौटी तो हवा पानी बदलने के लिये दिवा को साथ लेती आयी थी ।
                                फिर वह शायद अनिवार्य हादसा ही था उस रात, कि तब देर रात दिखाई जाने वाली शुक्रवार की फिल्म दूरदर्शन से प्रसारित हो रही थी ।बाहर मौसम बेहद खराब था । आसमान में गड़गड़ाते जलधर और चमकती बिजली वातावरण को अपनी रुपहली चमकसे एक पल के  लिये प्रकाशित कर फिर से अंधेरे में डुवा जाती थी । अपने कमरे में निकट बैठे दीपू और दिवा   टटोलने के लिये हाथ बढ़ाये,तो एक-दूसरे के अनियन्त्रित उत्तेजित शरीर उनकी जद में थे । घिरते   घुमड़ते बादल खूब बरसे उस रात ।    
                सुबह दिवा में संकोच और शर्म में डूबी थी, जब कि दीपू पूर्ववत स्वच्छन्द और मुखर मुद्रा मौजूद था दबे स्वरों में दिवा ने रात में गलत हो जाने की बात कही तो वह फट पडा था- कैसी गलती?काहे की गलती ?आपने समझा है कभी एसी प्यारी गलतियों के बारे में ? जिसे आप गलती कह रही हैं, वह
 तो इस दुनिया का मूल है सत्य है!
                ”पर हमारा समाज  और उसके कायदे
                ”किस कायदे की बातें कर रही हैं मैडम ?चलिए, आप की ही भाशा में बात करूँ।
आपने तो पुराण साहित्य खूब पढा है कोन देवता ऐसा है जो काम के पाश से बचा रह गया
है?इन्द्र! ब्रम्हा! महेश! है कोई उदाहरण?“
?
                ”   ध्यान रखो कि जायज-नाजायज रिश्तों की बातें नपुंसकों की बकवास है सबदीपू का स्वर तिक्त हो उठा था और दिवा को चुप रह जाना पडा था । इसके बाद दिवा ने प्रतिरोध नहीं किया था और कई दफा उस अनुभव को जिया था , । दीदी के यहाँ से लोटना बहुत अखरा था उम्र में पॉच वर्श छोटे नाबालिग दीपू के साथ जिन्दगीभर रहने की अनुमति कोन दे सकता था उसे, न घर वाले, न समाज और न कानून  ।
                घर लौटकर द्वन्द्व में जीने लगी थी वह कोमल मन पर पडे नैतिकता सम्बन्धी सस्ंकार उस पर हावी होने लगते थे।  उसके लिए लडका ढूँढा जाने लगा। बिपिन से रिश्ता हुआ।
                उसका विवाह हुआ। वह श्री मती दिवा बनकर इस घर में आ गई थी। अपने आपको नई जिन्दगी के प्रवाह में सम्मिलित करके उसने पिछला सब कुछ भुलाने का प्रयास किया था। बिपिन को तो घर में लगातार आते संकटों के कारण अपनी जिम्मेदारी और बीमार पिता से सरोकार रखने के अलावा इतनी फुरसत नहीं थी कि ज्यों-त्यों दिन गुजर रहे थे।  तभी हटात दीपू एक दिन उसकी ससुराल आ धमका था। दोनों मे बहस छिड गई थी पुराने सम्बन्धों को लेकर। दिवा पुरानी गलती न दोहराने की दुहाई दे रही थी, जब कि सूखकर कॉटा हो रही उसकी देह और दिनोंदिन बढते जा रहे चिडचिडेपन को अतृति- चिन्ह बताकर दीपू उसे प्रात्साहित करता रहा थार्। वह कहता था न पहले  गल्ती थी , और न अब है। पर वह न राजी थी । दीपू उसका मुखर प्रतिरोध देखकर वापस लोट गया था, और कई दिनों तक इस उलझन में उलझी रह गई थी कि किसके प्रति वफादार रहे वह, दीपू के या बिपिन के । मौजूद होने पर बिपिन पर भी तरस आता था उसे , क्याकरे बेचारा? न बाप के प्रति लापरवाह हो सकता है न अपनी नौकरी के प्रति । वैसे उसका तो दीवाना  है वह जब तक रहेगा ऐसे ताकता रहेगा, जैसे आँखों के रास्ते पी ही जायेगा उसे । घर और पिता से बचा रह गयाा समय वह दिवा को देता था। थके और श्लथ शरीरों को उस थोडे रात का मूल्य ही क्या था। हाँ बिपिन की गैर मौजूदगी में जरूर उसे गुस्सा आता रहता था।
                दीपू के लौट जाने के बाद बडी अन्यमनस्क बनी रही थी उस दिन और चाहती रही थी भीतर-ही -भीतर कि दीपू फिर लैाट आए। लेकिन जिस दिन दीपू आया, खुल कर स्वागत  नहीं कर सकी थी उसका किवाड खोलकर देहरी पर ठिठकी रह गई वह । कई क्षण बीत गए थे
                ”अन्दर आने के लिए नहीं कहोगी ?“
                दिवा ने एक भरपूर नजर से उसे देखा था और मुडकर भीतर चली गई थी। दीपू पीछे- चल पडा था।                 ”आओ भी नहीं कहा
               ”कुछ आगमन ऐसे भी होते हैं जिनकी प्रतीक्षा भी होती है और वे टल जाँए तो निश्कृति का बोध्
भी। शब्दों से स्वीकृति देने की निर्द्वन्द्वता और साहस नहीं है मुझमें दीपू । चाह तो होती है तुम्हारी ,पर जाने कैसे कॉटे बिछे हैं कि दौडकर तुम्हें अपने में समेट लेने की आतुरता ठिठक जाती है । पूछा मत करो तुम ।
                ”कैसे हो
                ”ऐसे पूछ रही हेा, जैसेपिछले जन्म के बाद मिली हो।
                ”तुमसे मिलकर हर बार पुनर्जन्म ही तो होता है मेरा।
                ”दर असल , ये दिमागी जडता ही तो तुम्हारी कमजोरी है।
                नहीं दीपू, मैं न लकडी-सी जल पाती हूँ और न आग से अप्रभावित हो रह पाती हूँ। सीलन और ताप के बीच धँुधआते रहना ही शायद मेरी नियति है। तुम समझा करो कुछ।
                इससे ज्यादा बात नहीं कर सके थे वे दोनों । रश्मि आ गई थी । फिर वह रात भी बातों -ही -बातों में बीत गई थी ,बिपिन केा भूल कर दीपू में खो गई थी वह । ढेर सी बातें और ढेर से विशय थे उन दिनों के पास, जुबान थकती न मन भरता था। सुबह दीपू लौट गया था।
                तब से यही क्रम जारी है। महीना पन्द्रह दिन मे दीपू आता है और कोशिश करता है कि उसकी झिझक टूटे , लेकिन दिवा उवर नहीं पाती है अपने द्वन्द्व से । कई दफा तो लगता है कि दीपू का आना सार्थक हो ही जाएगा, पर बात बस कुछ कदम आगे बढती है और श्लथ होकर गिरी रह जाती है मंजिल के पहले ही
                अचानक घंटी बजी तो चिहँक उठी। दरवाजा खोला तो गैस वाला था।वाह इस बार बडी जल्दी आ गई गैस।कहते हुए उसने रास्ता दिया और सिलेण्डर बदलवाने लगी।
                गैस वाले को गिनकर रुपये दे रही थी कि घण्टी फिर बजी। उसने दरवाजे की ओर झाँका तो तबियत प्रसन्न हो उठी । वहाँ मौजूद लकदक दीपू उसकी अनुमति के इन्तजार में तत्पर खडा था।                                                                                           0000

माया महा ठगिनी हम जानी

      कहानी राजनारायण बोहरे                             माया महा ठगिनी हम जानी               ये हुआ ठंड का मौसम , कोलाहल में था ल...