रविवार, 15 मार्च 2026

माया महा ठगिनी हम जानी

 


 

 

कहानी

राजनारायण बोहरे                             माया महा ठगिनी हम जानी

             

ये हुआ ठंड का मौसम , कोलाहल में था लेकिन गांव में  मौत।

               लूले कक्का ने देखा कि चंपाप्रसाद की दालान में हलचल थी। महफ़िल में परमा खवास , खेता भोई और रत्ना प्रजापत वाइकी की चंपाप्रसाद की पूरी काउंसिल मौजूद थी। चंपाप्रसाद  कबीर का भजन गा  रहे थे-

माया महान ठगनी हम जानी 

केसव के कमला वे बैठी  शिव के भवन भवानी

योगी के योगन वे बैठी राजा के घर रानी 

भगतन की भगतिन वे स्थान  ब्रह्मा के ब्रह्मा के  ब्रह्माणी

कहे कबीर सुनो भाई साधो यह सब अकथ कहानी



            लूले कक्का दालान  के सामने से निकल रहे थे, वे एक पल को रुके । फिर  गहरी नजरों से चंपाप्रसाद को अंदर तक    बेधते हुए बोले- '' आजफे भैया कालकाप्रसाद अस्पताल के पास वाली सड़क पर चेलम्मा नर्स के संग टहलते मिले थे। एक दिन जाके देख तो लो कि वा आग लगी माया कौन है। कल को कहीं ऐसा न हो कि कालकाप्रसाद के संग-संग पूरे गांव की नाक काट ले जाए। ''

            चंपाप्रसाद अंदर ही अंदर तिलमिला उठे , पर प्रकट में चुप रहे।

               लूले कक्का ने अपनी वैशाखी संभाली और उठकर सभी पंचों से '' जय राम जी की '' कहते हुए मूंछों ही मूंछों में गुड़ियाते वहां से चल पड़े।   परिषद  के लोग एक-एक करके वहां से खिसकने लगे।

               लूले कक्का   चंपाप्रसाद को जैसे अपने तख्त पर कीलित से  कर गये ।

               बड़े भैया की खबरें सुन-सुन के कान पक गये ।   जल्दी ही कुछ करना होगा । आज अम्मा जीवित होती , तो आपके कालका भैया को डांट दिलवा देते । वैसे यह भी सच है कि आज जो स्थिति है उसके लिए पूरी तरह से अमाम ही दोषी है।    

               पन्द्रह साल के ही हो पिए थे कालका भैया , कि आग लगे आमखेड़ के खूब बजीता चौधरी खानदान के ज्वाला  प्रसाद सगया बनके आ गए थे। अम्मां ने न किसी जान पहचान वाले से कुछ पूछा , न ही चाहने वालों  दो दोस्तों की चर्चा   की और खुद मुख्तार होके रिश्ता तय कर दिया।

               एक ही दिन में नारियल-रुपया चला गया तो अम्मां बहुत खुश थी।

               आठवीं पास करते-करते कालका भैया की शादी हो गई। चमकीली चुनी ओढे , लाल-सिंदूरी में लाली गोरी-भूरी बहू के मेंहदी रचे हाथ-पांव देख कर दूसरे किशोर रोमांचित हो रहे थे , कालकाप्रसाद का तो बड़ा हाल बुरा था!

               अम्माँ बारात  की पहुनाई के किस्से सुन रही  थी , कि मुन्नी जिज्जी बोली- भौजी तो निराट पागल है।

                महत्वं बनाएं और लपकती हुई। दो-पल मे  माथा तिलकी बाहरी दृश्य वाला- नासपीते समुद्र तट ने धोखा दे दिया।   सिरन मुड़ी ब्याह दी धुआं लागे ने।   देखा होगा कि घर में चालीस बीघा की जोत है , विरासत में गांव के डाकुओं का काम है। हजारों की संख्या में एक से एक ऐसे दिखने वाले मखमली ल्म्बा ल्छारा  लड़के हैं। सो राख भये ज्वाला  की नियति डोल गई।

               मुन्नी जिज्जी ने इशारा किया तो अम्मा चुप रह गई थी।

                अम्मां ने  गप्पो खवासन को  बुलाया। सौगंध देकर  उसे बहू के पास भेजा। दुल्हन से बातें करती है गप्पो उसकी मसाज करने के बाद पूरे शरीर पर हाथ फेर आई थी। उन्होंने अम्मां को बताया कि बहू की देह में लुगाइयों जैसा कुछ नहीं है। इसे मर्द बैयर के सबंध रिश्ते के बारे में कुछ भी नहीं पता ।

अम्मां ने फिर भी कहा नहीं हारी थी।

               एक दिन पडौस में गारी के बुलौआ का श्रृंगार कर वे मुन्नी और चंपा को साथ ले गई थीं , ताकि घर पर अकेले बालका और बहू की मुलाकात में कोई बातचीत हो सके।

               मिनिमम डेट के बाद ही बाकर में से बहू के रोने-चिल्लाने की आवाज आई तो किसी ने किसी दोस्त को खबर दी थी। अम्मां ने घर आके बहू को पुचकार के चिप्स के कपड़े दिए।

               अम्मां ने बहू को सुदामती करने के लिए गांव भर के भगवान-घटोइया , देई-देवता को सलामती कर दिए थे। पर सब उपयोगी हो रहा है। चंपा को याद है कि पहले इसी तरह भौजी बावरी सी बनी थी, जो कभी भी   बाहर चली आती थी। वे कभी-कभी बालवाड़ी की मोरी पर बिना लांछन धोती उठाके पेशाब को बैठ जाते हैं।

               ऐसी बातें छिपी नहीं छिपतीं , तो एक मुंह से दूसरे , फिर तीसरी हुई कालका की बहू के पागलपन की बातें घर-घर में पहुंच गईं।

               सावन का महीना आया। आम सहमति से कालका भैया के साले अपनी बहन को लिवाने आए तो अम्मां ने अपनी खूब आव-भगत की और भौजी को बिदा करके हमेशा के लिए अपना हाथ झटका दिया।

               महीना बीत गया। आम सहमति से एक दो कहातें आयं। तीसरी बार बमप्रसाद खुद आये। पर अम्मारं नहीं मन।   भौजी कंपनी में ही पसंद लगी।

               मिडिल पास करते हुए चंपाप्रसाद की भी शादी कर दी थी अम्मां ने। इससे पहले मुन्नी जिज्जी ने भी शादी करके सस विदा कर दिया था।

               चंपाप्रसाद की बहू घर में आई , तो कालका भैया का बॉल में प्रवेश वर्जित हो गया। वे दालान या पौर में ही बैठे रहते थे या फिर स्मारक के साथ डाक का काम करते रहते थे।   वे भुरहरा-बेला खेत-टागर में निकल जाते हैं फिर रात ब्यालू की बिरिया तक वहीं रहते हैं।

               ऐसे में ही एक दिन अचानक दिखने वाले आर्किटेक्ट के रूप में घूमता रहेगा। घर पर आफत टूट गई थी। अम्माँ का धैर्य एक बार फिर काम आया। उन्ने त्राहिमाम के पहले ही कालका प्रसाद होने पर डाक का काम संभलवा दिया। बाद में कालकाप्रसाद का नाम भी बंद हो गया , तो अम्मां ने चैन की सांस ली थी। गांव के राम जानकी मंदिर की सेवा पूजा में भी पंचों ने कालकाप्रसाद दिया था।

               कार्तिक का महीना आया तो गांव भर की ओरते '' कतक्यारी '' बन गए और कार्तिक नहान का व्रत ले गए। हर दिन दोपहर पांच बजे और होठों के ठट्ठे कुआं-तालाब की तरफ चल पडी । नहाने  के बाद भी मूर्ति में ही स्त्रियां मूर्ति के आसपास गोल बनाकर बैठती थीं, फिर देर तक भगवान को पूजती रहती थीं। वे एक साथ खूब चुहल बाजियां भी देती हैं। इस तरह की भीड की  सुरक्षा के लिए एकाध मर्द को बहुत आश्वासन दिया गया था , इसलिए सभी महिलाओं ने एकता घोका-विचारी बनाकर पुजारी कालकाप्रसाद से थराई -विनती करी और उन्हें संस्थान के बख्त के साथ चलने को बरकरार रखा।

               चंपाप्रसाद का अनुमान है कि बाहर से वैराग्य का प्रदर्शन करते हुए कालका भैया का मन अंदर से तब भी अनुरागी रहेगा। एक एनाउंसमेंट में उनका मन कैसे स्थिर रहता है , जब एक कपड़ा खराब पर लाले होते हैं , अगल-बगल से अपने गुंडे-थोस स्तनों की झलक दिखाते हैं , कनखियों से कालका की नजरें दिखाई दे रही हैं, सुखानुभूति में अर्धांगना स्त्रियों की पूजा का लुक कपड़ो में देर रात तक उनके सामने चुहल नजर आ रहा है  

               सुबह के स्नान में कटक्यारियों के सखा बने कालका भैया भैया के दूसरे स्नान के बाद लौटती नई सखियों का प्रस्थान करते....कालका भैया को सखियों का सखा बने , सवैया , लावनी और दो मुखाग्र याद थे , जबकि सखियां अपने हाथों में किताबें लेकर मुकाबला करती थीं। -

               मित्र यहाँ दधिदान लागे , मम घाट यहाँ तू जानत नहीं।

               दै दधिदान खाउँ जाव घरै , बस और यहाँ कुछ लागत नहीं।।

साखियाँ-

               इकली छेड़ी वन में आय श्याम तूने कैसी थाणी रे....

               कंस राजा ते करुं पुकार , मुसक बंधवाय दिवाऊं मार ,

               तेरी ठकुराई देय निकार ,

               जुल्म करे नहीं डरे तू नारी विरानी रे.... इकली छेड़ी ....

               का लका भैया मंदिर में बैठे के प्रेमसागर की कहानी सुनते हैं। कृष्ण चरित्र की कथा में गहराई डूब गई और भ्रम हुआ कि वे कान्हा बन गए  , और वे कुछ ऐसी-वैसी हरकतें कर गए।

               शुरू हुआ मजाक मन के किसी ने रोज-रोज वही कहा! एक महिला ने घर जाके फरियाद कर दी , तो उस दिन लपटन नगरिया उलाहना लेकर आम के पास चली गई।

               अमाम ने संकेत-बुझा के वापस भेजा , तो अगले दिन पंचमसिंह दाऊ और उदास थे। अब करी बीध गई थी , पटका हुआ था। अम्मां ने अपनी थारै विनती कर क्षमादान और कालकाप्रसाद को ताजा ही कथा-भागवत के कार्य से बेदखल कर चंपाप्रसाद को उन पर आरोप लगाया था।

                कालका भैया के मकाखानों के तनख्वाह और पुरोहिताई-चौधरी से इतनी मिलती-जुलती हो जाती है कि अल्लै-पल्ली पैसा बरता। उनके घर के लोग कभी भी ज्यादा खर्चीले नहीं रहे। सब मोटा मोटा मोटा। तो समय-समय पर घर में पैसा बना रहता है। अड़ौस-पड़ौस में जिसे जरूरत थी , अपने काम काज को रूपया मांग लिया गया। बाद में चंपाप्रसाद ने ब्याज पर रूपया कर्ज लेना शुरू कर दिया। इससे उनका मान-सम्मान और बहुत बढ़ गया। अब वे कंगला ब्राह्मण नहीं थे , बल्कि गाँव के सबसे बड़े किसान हो गये थे। 

धन और प्रतिष्ठा   , तो ब्राह्मण समाज की परंपरा-पंचायतों में वे पंच बनायें।

 

               शुरुआत में तो अमां के पास जब-तब कालका भैया की बड़चलनी की रिकॉर्डिंग आतिन तो अमां उहैं खूब रातें। बाद में वे बेशर्म होने लगे। एक अस्पताल के मदार (हलवे) नत्था की परित्यक्ता बहन झुमकी से संबंध बनी और अम्माँ ने गहरी नींद ली तो उन्ने अम्माँ को बहुत खरी-खोटी बताई। असली खेती बागों का खतरा तो घर में सिर्फ अजनबियों के पास था। इसलिए सब लोग कालका प्रसाद से दबते भी थे। 

               अभी साल भर पहले की बात है। उस रात को अचानक गायब हो गया , तो उन्हें दोस्ती ही मोटर सायकिल पर डॉक्टर के जन्मस्थान तक भाग जाना पड़ा। सारा घर परेशान हो उठाओ। आख़िर।लगे। बोतलें चढीं। पर अम्मां बच नहीं पाईं। घर पर अचानक गैस सी गिर गई। 

               कालका भैया का ध्यान पूरी तरह से खेती में लगने लगा। एक-एक करके चार कुंये खुदवाये और पूरी जमीन पटवारी की ही में सिंचित रकवा के रूप में दर्ज हो गई। बैल की तरह वे खेत टगर में घूमते रहते और फसल के सीजन में धन-धान्य से घर भर देते। हां ठसके से रहने का नया शौक चर्राया था उन्हें। सफेद उजले कमीज-पजामा पहनकर पावों में वे चमड़े के पंप-शू पहन लेते। सिर में महकौआ तेल चुपड़ कर प्रायः गांव के बस स्टैण्ड पर सुबह ही जा बैठते, फिर सांझ ढले वहां से लौटते।

               छह महीना पहले गांव में नया सरकारी अस्पताल खुला और दक्षिण भारत की एक नर्स उसमें स्थायी रूप से नियुक्त होकर रहने के लिए आ गई थी।

               पता लगा कि यह नर्स केरल की रहने वाली है और इसका नाम चेलम्मा है।  चम्पा प्रसाद ने चेलम्मा की सराहना सुनी थी कि इतने दूर से अकेली चली आई चेलम्मा सचमुच बड़ी निडर और समझदार औरत है। उसकी तत्परता का ये हाल था कि गाँव में से रात बिरात जब भी बुलौआ पहुँचता वह तुरंत ही अपने कंधे पर सरकारी बेग लादकर हाथ में टॉर्च ले तेज कदम रखती फटाक से गाँव में आ धमकती।

               उन्हीं दिनों की बात है। अचानक कालका भैया को पूरे बदन में खुजली का रोग फूट निकला। ऐसा भयानक कि वे बेहाल हो उठे। एक दिन अस्पताल जाकर कालका भैया ने खुजली की दवा मांगी, तो नर्स चेलम्मा ने बिना किसी लिहाज के अपने हाथों कालका भैया के शरीर पर नीली सी दवा पोत दी थी। 

               चंपाप्रसाद को ठीक से याद है कि कालका भैया तब से रोज ही अस्पताल पहुंचने लगे हैं। घर से प्रायः दालें-दफारें, गेंहूं-चना यानी कि फसल पर जो भी चीज पैदा हो झोलों में भर-भर के चेलम्मा के पास पहुंचने लगी हैं। चंपाप्रसाद यह सब देखके जान बूझकर चुप रहते हैं।पर आज जिस तरह से लूले कक्का ने उन्हें उलाहना दिया, उससे लगता है कि अब गांव वालों के पेट में दर्द हो उठा है।

               बेटी की आवाज से वे चौंके। दोपहर के दो बज गये हैं और ने अभी तक न नहाया-धोया न पूजा करी।

                धोती-बनियान लेकर बाखर के पिछवाड़े वाले हैण्डपम्प पर पहुंचे।सिर पर ठण्डा पानी गिरा तो अभ्यस्त भाव से उनने हनुमान चालीसा बोलना शुरु कर दिया -जय हनुमान ज्ञान गुण सागर.........

               पूजा करने बैठे तो लाख जतन करने से भी ध्यान में मन न लगा। आंख मूंद के बैठे रहे।

               याद आया ...लूले कक्का ब्राम्हण हैं और उनका छोटा बेटा प्रकाश पैंतीस साल का होकर अनब्याहा था । उसने एक बाल विधवा हरिजन लड़की से संबंध जोड़े तो ब्राह्मन्न  पंचायत बैठी थी । तब पंच की हैसियत से चंपाप्रसाद ने प्रकाश के खिलाफ फैसला दिया था और  लूले कक्का का गांव भर में हुक्का पानी बंद हो गया ।

               आज लूले कक्का वही बदला ले रहे हैं । कल यही बात बाम्हन विरादरी में जायेगी । बरतन के मुंह पर तो ढक्कन हो सकता है, पर आदमी के मुंह पर कोई ढकना नहीं होता। कौन-कौन का मुंह रोकते फिरेंगे वे !

               मुन्नी जिज्जी की ससुराल तक भी बदनामी पहुंचेगी तो बहनोई और उनके पिता की कहलान आ जायेगी। चंपाप्रसाद की खुद की ससुराल में यह प्रसंग नमक-मिर्च लगाके पहुंचेगा तो कितनी शर्मिन्दगी उठाना पड़ेगी।

               इस समस्या का समाधान कहो, रास्ता कहो अब हल तो एक ही है कि कालका भैया को खुली साफ जुबान से समझा दिया जाये कि - तुरंत बंद करो अब अपने ये एैल-फैल।  छोड़ो उसे !

               कालका भैया  पर दबाब बनायेंगे। मुन्नी जिज्जी के ससुर को बुला लेंगे, मामा को बुला लेंगे। जिसका भी कहा मानें।

               चंपाप्रसाद ने  धर्मग्रंथ का अध्ययन किया है कि जब किसी व्यक्ति पर वासना का भूत चढ़ता है, तो वो किसी की नहीं मानता।  भीष्म के पिता शांतनु इसी उम्र में मछुआरे की लड़की पर मोहित हुये थे, और इसी अवस्था में पहुंचकर राजा ययाति भी देवलोक की अप्सरा के वशीभूत हो गये थे।

               सहसा वे रुके........ कहीं कालका भैया ने  चेलम्मा से संबंध नहीं तोड़े, तो?

                दो-तीन रास्ते सूझते हैं उन्हें।

               एक तो यही कि बदचलनी के अपराध में ब्राह्मणों की बिरादरी से बहिष्कृत करवा सकते हैं,  थू-थू भी करा सकते हैं, कुर्रू बुलबा सकते उनकी ।

               एक रास्ता यह भी है कि अस्पताल और डाकघर के बड़े अफसरों के पास जाकर नर्स को यहां से दूर कहीं तबादले पर भी फिकवा सकते हैं वे थोड़े प्रयत्न से, ......... और तबादला न हो पाये तो कालका भैया व उसके हाथ-पांव भी तुड़वाये जा सकते हैं। उनके ये इगड़े-बिगड़े चेले कब काम आयेंगे भला !

             फिर एक प्रश्न चिन्ह उठा कालका भैया आखिर उनके बड़े भाई हैं, हर रास्ते की काट सोच लेंगे। उन पर विरादरी और गांव के प्रतिबंधों का भला क्या असर होगा? वैसे भी सुबह पांच बजे से रात दस बजे तक खेत-टगर में समय काटने वाले कालका भैया को इन गांव वालों, जाति वालों और सरकारी अफसरों का भला क्या डर? उन्हें क्या मूसर बदलना है किसी से ! किसी से अपनी संतान थोड़े ब्याहने जाना है। निःसंतान रण्ड-सण्ड आदमी। आज मरे कल तीसरा। चंपाप्रसाद बैचेन हो उठे।

               कालका भैया  कह सकते हैं  चलो मेरा हिस्सा-पटा कर दो  !

               हिस्सा-पटा !

                हिस्सा माने आधी जायदाद, माने कुल जायदाद में से तीस बीघा जमीन, दो कुँआ, दो भैंसे, तीन बैल और आधी बाखर। अर्थात घर का सब कुछ आधा-आधा। यदि आधा धन चला गया तो क्या बचना है ! जिस जमीन जायदाद के जोर पर उछल रहे हैं वहीं न बची तो क्या इज्जत रह जायेगी?  सारे अरमान अधूरे रह जायेंगे। कैसे संभालेंगे वे अपनी कच्ची ग्रहस्थी?  कैसे संभालेंगे वे अपनी खेती?

               उन्हें अपने भाई पर एक बार फिर झुंझलाहट हो आई - ये कालका भैया भी खूब हैं ! अरे दिल भी लगाना था तो किसी ब्राह्मणी से लगाते।  मन मार के उस औरत को घर में ले आते।  कदाचित यही औरत उत्तरी न सही दक्षिण भारतीय ब्राह्मण होती। तो भी वे कुछ सोचते। इधर घर की जायदाद बची रहती, उधर नर्स की तनख्वाह के नये करारे पचास हजार रुपये के नोटों की गड्डी हर माह घर में आने लगती।

               चम्पाप्रसाद का मस्तिष्क कुछ तेज ही चलता  है।  सारे ब्राम्हण एक ही तो हैं चाहे उत्तरी हो चाहे दक्षिणी। यह तो भौगोलिक भेद हैं।  मनुष्य-मनुष्य वैसे भी एक से होते हैं। वही हाथ-पांव, वही खून-मांस, काहे का फर्क और काहे का भेदभाव? 

               वे अनायास चेते। उन जैसा कर्मकाण्डी-वेदपाठी व्यक्ति ऐसा सोचने लगेगा तो समाज के दूसरे लोगों का क्या होगा? यह तो पाप हैं, घोर पाप।

               एक पल मस्तिष्क शून्य रहा फिर याद आया ...तुलसी बाबा कह गये हैं- कलिकर एक पुनीत प्रतापा, मनसा पुन्य होइ नहीं पापा। ये भौतिक जमाना है। रुपया पैसा ही सबकुछ है इस युग में। सम्पत्ति बचा लेना सबसे बड़ी सफलता होगी इस जमाने में। महा ठगनी माया बचना जरुरि !

मनु स्मृति में कहा गया है कि स्त्री की कोई जाति नहीं होती। जिस बिरादरी  जिस खानदान में ब्याही जाये उसी जाति की कुलवधू कहलाती है। महा ठगनी माया से कबीर बाबा का पद फिर याद आया, तो गुनगुनाने लगे-

माया महा ठगनी हम जानी
पंडा के मूरत ह्वे  बैठीं तीरथ में भई पानी
योगी के योगन ह्वे  बैठी राजा के घर रानी
भगतन की भगतिन ह्वे  बैठी ब्रह्मा के ब्रह्माणी
कहे कबीर सुनो भई साधो यह सब अकथ कहानी

               पूजा पर बैठे-बैठे ही चम्पा प्रसाद ने मन ही मन बड़ा भीष्म निर्णय लिया चेलम्मा अब इस घर में जरुर आयेगी। वह अगर ब्राम्हण जाति की ना भी हो तो क्या फर्क पड़ता है।  अभी चलके ब्याह की बात करते हैं और उसी से कहला देंते हैं कि  वह केरल के नम्बूदरी ब्राम्हण खानदान की कन्या है। फिर क्या है, गांव में मंदिर में जाकर विधि विधान से कालका भैया की सप्तपदी करा देंगे, गांव वालों को खीर-पूरी के साथ पचबन्नी मिठाई की पंगत जिमा देंगे सो वे भी चुप। 

               चेलम्मा से कहके केरल के रहने वालों में से इधर आसपास कहीं कोई परिवार होंगे तो उन्हें न्यौता भेज देंगे। विवाह संस्कार को ‘‘दक्षिणी विवाह पद्धति’’ से सम्पन्न करा देंगे। मलयाली स्त्रियाँ इस अवसर पर कितनी भलीं लगेंगी जब वे एक स्वर होके गायेंगी-

राजपुत्रि निन् अऴकिन्नार् वर्ण्णिक्कुं

निन्टे नाथन् निन्आऴकिल्

ऎन्नुं संप्रीतन्

आन्तरीकमल्लयो निन्

सौन्दर्यं सर्व्वं

निन्टे नाथन् राजवॆन्नुं

निन्निलाकृष्ट्टन् (राजपुत्रि.. )

               उनके मन का सारा द्वंद्व  शांत हो गया - चलो जायदाद बची! महा ठगनी माया बची रह गयीं !
            वे आंगन में  आगये। नौहरे में भैंसे और गायें बंधी थीं। वे उनके पास गये और सींग की जड़, कान और गर्दन को खुजलाया फिर ढोर के गले में नीचे लटकी नर्म खाल की झालर सहलाने लगे ।

               दिन ढल रहा था पर उन्हें न भूख थी न प्यास। कुछ देर बाद ही वे धुले-चमकदार धोती-कुर्ता पहन कर नये पम्पशू पांव में उलझाये घर से बाहर निकल पड़े थे।

               अस्पताल जाने वाले रास्ते पर मुड़ते हुये वे एक कुशल संवाद लेखक की तरह ऐसे वाक्य रच रहे थे, जो चेलम्मा के मुंह से बुलवाये जाने पर न तो बनावटी लगें और न अस्वाभाविक।

               अब न उन्हें बैचेनी थी और न कोई भय। बल्कि एक अजीब सी उत्तेजना थी। उनकी चाल को देख के यह उत्तेजना सहज ही समझ में आ जाती थी।

                                                                           -----

 

 

बायोडाटा

राजनारायण बोहरे

जन्म

20 सितम्बर 1959 अशोकनगर मध्यप्रदेश 

शिक्षा

विधि और पत्रकारिता में स्नातक एवं हिन्दी साहित्य के स्नातकोत्तर

प्रकाशन

*कहानी संग्रह- 1 इज्ज़त-आबरू 2 गोस्टा तथा अन्य कहानियाँ 3 हादसा 4 मेरी प्रिय कहानियाँ 5 हल्ला

*उपन्यास-1 मुखबिर 2 अस्थान 3 आड़ा वक्त

*बाल उपन्यास- 1 बाली का बेटा 2 रानी का प्रेत 3 गढ़ी के प्रेत 4  जादूगर जंकाल औऱ सोनपरी

5 अंतरिक्ष में डायनासोर

*बाल कहानी संग्रह - आर्यावर्त्त की रोचक कथाएँ

सम्मान –

 साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश का सुभद्राकुमारी चौहान पुरस्कार एवं म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन का वागीश्वरी पुरस्कार, सन् १९९७ में कहानी “ भय ‘ पर तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री  अटल विहारी बाजपेयी के कर कमलों से पुरस्कृत

सम्प्रति – असिस्टेंट कमिश्नर जी एस टी से स्वेच्छिक सेवा निवृत्ति बाद स्वतंत्र लेखन

सम्पर्क – 89, ओल्ड हाऊसिंग बोर्ड कोलोनी, बस स्टैण्ड दतिया मध्यप्रदेश दतिया पिन  475661

Mobile 9826689939

Email- raj.bohare@gmail.com

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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