मंगलवार, 20 जून 2017







महेश कटारे की कहानी-
पार

           जान-पहचानी गैल पर पैर अपने-आप इच्छित दिशा को मुड़ जाते थे। हरिविलास आगे था-पीछे कमला उसके पीछे अपहरण किया गया लड़का तथा गैंग के तीन सदस्य और थे यानी कुल छह जने। जिस समय वे ठिकाने से चले थे तब सामने पूरब में शाम का इन्द्रधनुष खिंचा था अतः अनुमान था कि सबेरे पानी बरसेगा-संझा धनुष सबरे पानी। ठिकाने पर एक दिन भी सुस्ताते हुए न काट पाए थे कि मुखबिर की खबर आ गई थी-ठिकाने पर कभी भी घेरा पड़ सकता है। ऊपर का दबाव है इसलिए डी0आई0जी0 भन्ना रहा है। दो जिलों की पुलिस का खास दस्ता एक नये डिप्टी को सौंप दिया है। नाक में दम कर रखा है हरामजादे ने।
           ऊँ.... कुछ कहा हरिविलास पथरीली पगडण्डी पर बढ़ता हुआ            बोला।
           नहीं तो ! कमला जाने किस सोच से बाहर आई-कभी-कभी पहाड़ दूभर हो जाता है।
           बूँदा-बाँदी से रपटन बढ़ गई है। पहाड़ की ऊँचाई तो पहले ही जितनी है। बात को मजाकिया मोड़ देने की आदत है हरिविलास को।
           तीन घण्टे में इस कीच-खच्चड़ के मौसम में छह कोस बढ़ आना कम नहीं है। ऊपर से कंधे पर पाँच-सात सेर वजन बंदूक का रहता है पीठ के सफरी बैग में जरूरत की चीजें और कपड़े-लत्ते ठुँसे होते हैं। पुलिसवालों के खाने-पीने गोली-बारूद के इंतजाम में तो पूरी सरकार पीछे होती है। यहाँ तो एक-एक चीज़ खुद जुटानी पड़ती है। सुई से लेकर माचिस तक के लिए दहेज-सा देना पड़ता है।
           इस बार की पुलिसिया सरगर्मी में कमला के गिरोह ने तय किया है कि पूरब में पचनदा पार कर यू0पी0 में दस-पन्द्रह दिन गुजार लिये जाएँ। खबरे हैं कि उधर की पुलिस और सरकार दूसरी उठा-धराई में उलझी है इसलिए माहौल अनुकूल है। वैसे डाँग ही डाँग (जंगल) शिवपुरी की ओर भी निकला जा सकता था या धौलपुर को बगल देते हुए राजस्थान में भी कूदने से सुरक्षित हुआ जा सकता था।
           पहाड़ की आधी चढ़ाई तक पहुँचते-पहुँचते कमला की पिण्डलियाँ और पंजे पिराने लगे। धाराधार धावे में केवल दो जगह पानी पिया है। चलते-चलते बैठने पर थकान चढ़ दौड़ती है और बागी जीवन में आलस नींद और खाँसी तीनों खतरनाक हैं। माता की मढ़ी बस एक सपाटे-भर दूर है-बीस बाइस मिनिट का रास्ता पर कमला ने हाथ की टार्च जमीन की ओर झुकाकर दो बार जलाई-बुझाई। इसका मतलब वहाँ कुछ सुस्ताना है।
           वह पगडण्डी के पत्थर पर बैठ गई तो गिरोह आसपास सिमट आया। अपहत यानी पकड़ छीतर बनिया का पन्द्रह सोलह साल का लड़का है। पखवारे पहले गाँव के बाहर से गिरोह ने धर लिया था। हँगने आया था-पूँजी के नाम पर वही लोटा उसके पास है। दो लाख की फिरौती माँगी गई है। बिचौलिया एक पर लाना चाहता है। कहता है कि बनिया जरूर है जाति से पर दम नही है उसमें। गाँव-गाँव फेरी लगाकर परिवार पालता है। गाँठ की कुल जमा चार बीघा जमीन बेच-बाचकर ही एक लाख की रकम जुटा पाएगा। खरीदार भी तो ऐसे बखत औनी-पौनी कीमत लगाते हैं।
           कमला डेढ़ लाख पर उतरकर अड़ी है। गरीब सही, पर है तो बनिया ! हाथी लटा (दुबला) होने पर भी बिटौरा सा होता है।
           इधर आ रे मोंड़ा !
           कमला की कड़क से सहमता लड़का उकरूँ आ बैठा। थकान से वह भी टूटा हुआ था। कमला उसे लद्दू बनाए थी। लद्दू यानी लादनेवाला। छह कोस से वह कमला का बैग और बंदूक ढो रहा है। अपनी ग्रीनर दोनाली कमला को बेहद प्रिय है, पर लंबे कूच में वह केवल पिस्तौल लटकाती है।
           तेरी फट क्यों रही है  पास आ.....के !
           मर्दो की तरह गंदी-गंदी गालियाँ कमला के मुँह से शुरू-शुरू में लड़के को बहुत भद्दी लगती थीं पर अब जान चुका है कि यह सब काम मर्दो की नकल पर करती है। वैसे ही कपड़े जूते व्यौहार ठसक और डॉंट-डपट बदहवासी से बलात्कार तक...।
           कमला ने लड़के की ओर पाँव पसार दिए। लड़का कुछ और सरककर पिंडिलियाँ दबाने लगा। पैरों पर सिपाहियों जैसे किरमिच के बूट चढ़े थे।
           बाबा के पास चून धरा हो तो आज रात माता के मंदिर में काट लें  आसपास गीधों की तरह बैठे साथियों से कमला ने सलाह ली।
           रात-रात में ही पार होना ठीक रहेगा। डर के मारे वह खुद भी रात को सटक लेता है। दूसरे ने मत प्रकट किया।
           नदी का पता नहीं कि चढ़ी है या पाट है। चढ़ी मिली तो औघट पार कौन करेगा ये पिल्ला अलग से संग बँधा है-भो....का !
           अपने आदमी कुछ न कुछ इंतजाम करेंगे ही.....।
           वो बम्हना भी तो होगा वहाँ। महीने-भर में ही तबादला थोड़े हो गया होगा उसका। इधर आने को कोई तैयार नहीं होता सो तीन साल से मजा मार रहा है हरामी। लैनेमेन की तनखा झटकता है। काम क्या है .... बिजली का तार इधर से उधर उधर से      इधर। सो भी बिजली चली गई तो अट्ठे पखवारे-भर पड़ा-पड़ा पादता रहेगा। इन साले बाम्हनों को तो लैन में खड़ा करके गोली मार देनी चाहिए। सब सीटों पर जमे बैठे हैं।
           कमला ने चिड़चिड़ाकर लड़के पर लात फटकार दी-भैंचो....! हाथों में जान नहीं है क्या  अभी छूट दे दो तो भैंस को गाभिन कर देगा।
           आकस्मिक प्रहार से लड़का गुलांट खाता हुआ लुढ़क गया। दर्द से कराहता हुआ वह आँसूस बहाने लगा। पकड़ को इसी तरह रखा जाता है। भूख, मार और दहशत से इतना तोड़ दिया जाता है कि अवसर मिलने पर भी निकल भागने का साहस न कर सके।
           लड़के की दुर्दशा पर कोई न पसीजा। यह तो होता ही है- उठ बे ! साले ठुसुर-ठुसुर की तो गोली मार के घाटी में फेंक दूँगी। कहते हुए कमला की निगाह घाटी की ओर घूम गई।
           कमला मोहिनी में बँध उठी। घाटी और उसके सिर पर तिरछी दीवार की तरह उठे पहाड़ पर जगर-मगर छाई थी। जुगनुओं के हजारो-लाखों गुच्छें दिप्-दिप् हो रहे थे। लगता था जैसे भादों का आकाश तारों के साथ घाटी में बिखर गया है। चमकते-बुड़ाते जुगनू कमला को हमेशा से भाते हैं। सांझी में क्वार के पहले पाख में लड़कियाँ कच्ची-पक्की दीवार पर गोबर की साँझी बनाती थीं। दूसरी लड़कियाँ तो अपनी-अपनी पंक्ति तोरई के पीले लौकी के सफेद, या तिल्ली के दुरंगे फूलों से सजाती थीं, कमला अपनी पंक्ति में जुगनू चिपका देती फिर कुछ दूर खड़ी हो मुग्ध आँखों से अपना करतब निहारती थी। तब यह उसका खेल था- कहाँ समझती थी कि उसके खेल में जुगनू जान से जाते हैं।
           इलाके में आतंक है कमला का अपनी पर आती है तो किसी को नहीं छोड़ती। वह उसका खास था, जाति का था सप्लाई करता था, सुना जाता है कि कमला उससे जरूरत का काम भी लेती थी। गिरोह तक के लोग दबते थे उससे। अचानक जाने कैसे बिगड़ी कि कमला ने पचीसों के सामने उसके मुँह में मुतवाया और कोहिनी के ऊपर से दोनों हाथ गँडासेस से कतर दिए। जातिवाला था नहीं तो जैसा कि उसका तकिया कलाम है-अंगविशेष मे गोली घुसेड़ देती। वह आदमी इलाके में कमला का विज्ञापन बना घूमता है।
           चलो...माता की मढ़ी पै बिसराम करेंगे। कह कमला खड़ी हो गई।
           लड़के ने ग्रीनर बाँस की तरह कंधे पर रखी, ढीले बैग के फीते कसे और नाक सुड़कता हुआ बढ़नेवाले कदमों की प्रतीक्षा करने लगा। जानता है उसे न घाव सहलाने का     अधिकार है न दिखाने का। नाक में छल्ला-छिदे बछड़े की तरह उसी ओर मुड़ता है जिधर रस्सी का संकेत मिले।
           मंदिर पर पहुँच सबने चबूतरा छू, माथे से लगा, पा-लागन किया और जूते उतार फेरी लगाते हुए मढ़ी में घुस गए। मूर्ति के पैरों में एक चीकट दिया जल रहा था जिसकी आभा में मूर्ति प्राणवान् और रहस्यमय दिख रही थी। बाबा अँधेरा होते ही संझा-बत्ती कर शायद नीचे उतर गया होगा।
           पहाड़ के छोर पर बना यह छोटा-सा मंदिर रतनगढ़ की माता के नाम से प्रसिद्ध है। किंवदंती है कि दूज-दीवाली के दिन यहाँ आल्हा पूजा करने आते हैं। आल्हा अमर है-युधिष्ठिर का औतार। बड़े-बूढ़ों ने रात-बिरात किसी पचगजे (पाँच गज लम्बे) आदमी की पहाड़ी चढ़ती उतरती झलक देखी है। देखने वालों में ज्यादातर मर-जुड़ा गए। एकाध बचा है जिससे ब्यौरेवार कुछ पता नहीं चलता, बस धुंधा में कोई तस्वीर तनकर रह जाती है।
           मंदिर तक पहुँचने के केवल दो रास्ते हैं-एक तो पहाड़ी की कोर-कोर चलती ऊँची-नीची घुमावदार पगडण्डी और दूसरा खण्डहर हुए लौहागढ़ के किले होकर दीवार की तरह सीधी खड़ी पहाड़ियों के सिर पर माँग-सी-भरती तीन कोसी कच्ची सड़क। मढ़ी की छत पर बैठा आदमी पल्टन भी आगे बढ़ने से रोक सकता है। दो चार को तो गोफनी में गिट्टी भरकर निपटाया जा सकताा है।
           चौमासे में यह स्थान गिरोहों के लिए मैया का वरदान है। ऋषि-मुनियों की तरह दस्युदल चातुमार्स ऐसे ही ठिकानों पर बिताते हैं। कमला के गिरोह का नाई सदस्य हरविलास जनम का हँसोड़ है। कहता है- हम लोग जोगी-जाती हैं। करपात्री हैं। जब जहाँ जो मिल जाए खा लो और मौका मिल जाए तो सो लो। बाकी चलते रहो। जोगी-जती कहीं किसी से नहीं बँधते। हमारी भी वही गति है। न जिंदगी का मोह न घर-द्वार की मया (माया)।
           एक वही है जो कभी-कभी मौज में आकर कमला को बीबीजान कह देता है। पहली बार तो सुनकर कमला हत्थे से उखड़ गई थी, पर जब उसने बताया था कि फिल्मों में सबसे सुन्दर और घर की मालकिन को बीबीजान कहा जाता है तब से कमला यह सुनकर खिल जाती है। कमला ने हरिविलास की हैसियत बढ़ाई है, कैंची-उस्तरा की जगह बारह बोर सौंपी है।
           हरिविलास ने ही बताया था कि-बीबीजान को हम रण्डी समझते हैं.....कुछ जानते थोड़े हैं। जाननेवाले तो दिल्ली-बंबई में रहते हैं। तड़ातड़ मारनेवाले को वहाँ लाखों-करोड़ों, कोठी-कार मिलते हैं। हमें क्या मिलता है सेंतमेंत की दुःख-तकलीफ देते-लेते हैं।
           ऐसे में कमला हँसकर कहती है-साला नउआ घरवाली का टेंटुआ चीरकर     इधर क्या आ मरा  निकल जाता बंबई या दिल्ली।
           दिल्ली तो हम तुम्हें पहुँचाएँगे कमला बीबी ! वहाँ अपनी फूलन अकेली है- बस, एक बड़ा स्वयंवर रच दो। दिल्ली-बंबई वाले लार टपकाते तुम्हारे पीछे न घूमें तो मैं मूँछ मुड़ा के नाम बदल लूँगा। फूलन तो शकल-सूरत से मात खा गई। तू पहुँचते ही मिनिस्टर हो जाएगी।
           कमला सोचती है- नउआ ससुरा बड़ा ऐबी है। छत्तीसा साला ! सपनों के हिंडोले पे झुला देता है। प्रकट में कहती है- चुनाव तेरा बाप जितवाएगा
           मेरा बाप तो जाने सरग में है कि नरक में ....पर कोई न कोई बाप मिल ही जाएगा। और चुनाव तो आजकल जाति जितवाती है। तेरी जाति, मेरी जाति और बाप की जाति-बस हो गए पार। हरिविलास खी-खी कर देता है।
           टैम कितना हो गया ? कमला की पूछती निगाह हरिविलास पर घूमी। हरिविलास की घड़ी पानी भर जाने से बंद है। कमला की घड़ी पट्टा टूट जाने से सामान के साथ लद्दू की पीठ पर लदी है। बाकी बे-घड़ी हैं। बादलों की टुकड़ियों से सप्तऋषि और सूका (शुक्र) भी दुबके-ढके हैं।
           दस के लगभग होंगे। बन्दूक पर हाथ फेरते हरिविलास बोला।
           अब तो चार घड़ी यहीं बिसराम ठीक रहेगा। भोर में नदी पार कर लेंगे। छत की छॉव और चोटी का पवन पाकर गिरोह में आलस पसरने लगा था।
           थोडा-बहुत पेट में भी डालना है। भागमभाग में दोपहर आधा-अधूरा खाया, तब से एक घूँट चाय भी नहीं मिली।
           मौन स्वीकृति के साथ सबके झोले खुलने लगे। लड़के ने पीठ का थैला खोलकर कमला के सामने रख दिया। बोतल निकाल कमला ने तीन-चार बड़े बडे घूँट भरे। सबके पास इसी किस्म की बोतले हैं। इनका खास लाभ यह रहता है कि वजन में हल्की होती हैं। लड़का इस उसकी ओर टुकुर-टुकुर ताक रहा था कि कोई उसे दो घूँट पानी के लिए पूछ ले । मुँह से माँगने पर कमला के कोप का शिकार हो सकता है। संग-साथ रहते जान चुका है कि भूख-प्यास के बखत कमला खूँखार हो जाती है। पहाड़ी चढ़ते समय भी उसका गला चटका जा रहा था।
     प्यास के साथ उसे घर की याद भी आ रही थी। वहाँ पर वह भरपेट खाकर मजे से सो रहा होता। माँ याद आई- क्या वह सो चुकी होगी जग रही होगी। चारों भाई-बहनों पर हाथ फेरकर ही सोने लेटने है। मेरे बदले का हाथ किस पर फेरती होगी ?
     भूख-प्यास भूलकर लड़का झर-झर आँसू टपकाने लगा। हिलकियों से देह हिल उठी। कमला बिस्कुट कुतरने में लगी थी। भौंहे चढ़ाकर फुफकारती-क्या हुआ बे  बीछू लग गया क्या
     हिलकियाँ रोकने की कोशिश में लड़का और भी हिलने लगा।
     बोलते क्यों नहीं मादर....! कुछ खाने बैठो तभी खोटा करने लगता है। जी में आता है कि ....मैं गोली उतारकर ठूँठ पै टाँग दूँ हरामी को। चप....।
     कमला ने दो बिस्कुट उसकी ओर फर्श पर फेंक दिये। लड़का आँसू सँभालता हुआ बिस्कुट चबाने लगा। बिस्कुट का गूदा वह बार-बार जीभ से भीतरर की ओर ठेलता पर प्यासे मुँह लार न होने से पेट में न सरक पाता। लड़का घूँट से भरता बिस्कुट निगलने की कोशिश कर रहा था।
     दिए की पीली रोशनी में हरिविलास को लगा कि लड़के की आँखे बिल्कुल वैसी ही हो रही हैं जैसी उस्तरा गर्दन पर रखे जाते समय उसकी पत्नी की हो गई थीं। अनमने हरिविलास ने अपनी बोतल लड़के की ओर सरका दी- पानी पी ले पहले।
     लड़के ने बिस्कुट चबाती कमला की ओर देखा।
     पी ले ना ! हरिविलास ने नरमी से कहा।
     लड़का फिर भी हाथ न बढ़ा पाया।
     पी ना....के। हरिविलास की चीख मढ़िया में गूँज गई।
     लड़के ने सकपकाकर बोतल झपट ली। कमला मुस्करा उठी। दूसरे हँस पड़े- दीवारों के बीच कहकहे भर गए। माता की मूर्ति उसी तरह अविचल थी- सिंह पर सवार, सिर की ओर त्रिशूल ताने।
           सहमते लड़के ने गिनती के चार बड़े-बड़े घूँट भरे और ढक्कन कसकर बोतल हरिविलास की ओर बढ़ा दी।
           अब चल देना चाहिए। हरिविलास की गंभीरता से गिरोह के लोग चौंक गए।  
     क्यों ? यहाँ बिसराम .... दीवार के सहारे अधपसरी होती कमला ने पूछा।
           कान खोलो ! दखिनी तरी में मोर कोंक रहे हैं....सियार भी रोए हैं। दबस (दबिस) हो सकती है।’’
           अलसाता गिरोह चौकन्ना हो गया। कमला ने दीवार से टिकी ग्रीनर दुनाली झटके के साथ पकड़ ली। और कमर में बँधी बेल्ट से दो कारतूस निकाल तेजी के साथ बेरल में ठोंक दिए।
           अगले क्षण गिरोह खुले चबूतरे पर था। सबकेक आँख-कान टोह पर थे। अँधेरे में दुश्मन को गच्चा दिया जा सकता है तो दुश्मन भी अँधेरे का लाभ उठाकर घेर सकता है। मोर रह-रहकर कोंक उठते थे। संकेत, किसी के मंदिर की ओर बढ़ते जैसे थे।
           देखो-देखो। वो बाटरी चमकी !’’ तरी के घने बबूल वन में कुछ चमककर बुझा था।
     दूसरा गिरोह भी हो सकता है।
     कौन होगा ? चरन बाबा शहर में है। इधर है ही नहीं।
     देवा घूम सकता है। उसकी बिरादरी के काफी घर हैं इधर।’’
     पुलिस भी तो हो सकती है-गैल काटकर आ रही हो।’’
     डाबर में पुलिस वाले क्यों मरेगे ?
     नौकरी के लिए सब करना पड़ता है, मन-बेमन से।’’
     अब जल्दी से पार निकल जाना चाहिए।’’
     उधर यू.पी. की पुलिस डटी हो तो ? उधर की सूँघ-साँघ तो लेनी पड़ेगी।’’
           तो जा ! लुगाई के घाँघरे में दुबक जा। अबे साले, तू क्या पुलिस की जगह जिंदाबाद-जिंदाबाद गानेवाली भीड़ की उम्मीद रखता है ? बागी क्यों बना ? लुल्लू-लुल्लू करता घर रहता और टाँग पसारकर सोता।’’ हरिविलास की इस झल्लाहट पर चुप्पी हो गई। इसे अचानक हो क्या गया है ?
           जल्दी के लिए खड़ा उतार पकड़ा गया। टॉर्च जलाना खतरनाक था। पैरों को तौल-तौलकर रखना पड़ रहा था। लड़के को अब हरिविलास ने अपनी बगल में ले लिया- इन रास्तों के लिए कच्चा और निज़ोरा है लड़का। नेंक चूकते ही हजारों हाथ नीचे पहुँचेगा। हड्डियाँ भी नहीं बचेंगी- सबरे तक। लड़के की पीठ पर अब केवल सफरी बैग था। बंदूक कमला ने सँभाल ली थी।
           नीचे पहुँचते ही बेसाली के भरके (बीहड़) शुरू हो जाते हैं। यहाँ की मिट्टी पानी में बूँद के साथ घुलकर बहने लगती है। हर बरसात में बीहड़ा का नक्शा बदलता है। बड़े ढूह टूट और भहराकर निशान खो देते हैं तो छोटे ढूह नीचे की मिट्टी बहने से ऊँचे हो जाते हैं। हर साल पुराने के आसपास नए रास्ते बनते व चुने जाते हैं। गैर-जानकार के लिए पूरी भूल भुलैया हैं भरके। फँसने वाले का राम ही मालिक है। भेड़िए, बघेरे, साँप-सियार सभी का तो आसरा है इनमें। जंगली जानवरों से बचने के लिए गिरोह ने टॉर्च जला ली। रोशनी से चमकमकाए जानवर पास नहीं आते। पुलिस के यहाँ भय नहीं- कदम-कदम पर ओट व सुरंगो जैसे रास्ते हैं।
     आधी रात छूते-छूते गिरोह ने बेसली की रेत पकड़ ली। नदी में बाढ़ नहीं थी, पर बिना तैरे पार न हुआ जा सकता था।
     कमला ने नथुआ को बुलाकर समझाया-‘‘नत्थू ! तुम इस सुअरा को जलेकर खैरपुरा पहुँचो। मेहमानी करो दो-चार दिन। इसे भुसहरा में डाल देना- आराम कर लेगा। इधर की जानकारी लेते रहना ! ऐसी-वैसी बात न हुई तो छठे दिन मंदिर पै मिलेंगे। और सुन, चरन बाबा या भरोसा गूजरा की गैंग टकरा जाय तो बरक जाना। ये मादर....अपने को धरती से दो हाथ ऊँचा समझते हैं।’’
     नत्थू ने लड़के की पीठ से कमला का बैग निकलवाया और अपना कस दिया, फिर ‘‘जय भीमबोलकर दो छायाओं के साथ अँधेरे में समा गया।
     अब गिरोह तीन जगह बँट गया था। अपनी-अपनी जाति में सुरक्षा पाना आम चलन है। भरकों के बीच चौरस जगहों पर खेत हैं। जगह-जगह नलकूप व उसके साथ मंजिला-दोमंजिला कोठरियाँ हैं। आराम से खाते हुए पड़े रहो और खतरे की भनक मिलने पर बीहड़ में सरक लो।
     हरिविलास को कमला ने बिजली वाले रमा पंडित को लाने भेज दिया था। बाम्हन होकर भी तैरने में मल्लाहों के कान काटता है। यहाँ नौकरी करते, डाकुओं से साबका रोजमर्रा की चीज़ है, पर वह कमला से बेतरह डरता है। तरह-तरह के किस्से हैं, उसके बारे में-बड़ी जाति से घृणा करती है। आदमी छाँटकर महीने-दो महीने सेवा करवाती है, फिर गोली मार देती है। बुलावे पर पहुँचने की मजबूरी ठहरी-रोज यहीं रहकर बिजली के खंभों पर चढ़ना  उतरना है।
     रेत पर चित्त पड़ी कमला के पास पहुँच रामा ने हरिविलास के बताए अनुसार अभिवादन किया।
     तू ही रामा पण्डित है ? ’’ कमला ने पूछा।
     हाँ, बहन जी !’’
     भैंचो ....! तुझे मैं बहन दिखती हूँ ?’’
     रामा घबरा गया-मैंने तो .....मैं....माफ कर दें।’’ वह घिघियाने लगा। समझ नहीं पा रहा था कि कैसे संबोधित करें।
     ठीक है, जल्दी कर !’’ कमल बैठ गई- ‘‘और सुन, दगा-धोखा किया तो लाश चील-कौवे खाते दिखेंगे ! सामान ले जा पहले, तब तक मैं कपड़े उतारती हूँ।’’
     जी-ी-ी ?’’
     ठीक है।’’ रामा ने कंधे पर रखा मथना रेत पर रख दिया। बैग का सामान मथना के भीतर जमाया गया। दो बंदूकें खड़ी करके फँसाई गई।
     तुम दोनों इसके साथ तैरकर पार पहुँचो। मैं इसे निशाने पर रखती हूँ, तुम उस पार से से रखना।’’ कमला ने सुरक्षा-व्यवस्था समझाई।
     बादल छँट जाने से सप्तमी का चन्द्रमा उग आया था। पार के किनारे धुँधले-से दिखाई देने लगे थे। तीनों उघाड़े होकर पानी में ऊपर गए। कमर तक पानी में पहुँच रामा ने गंगा जी का स्मरण कर एक चुल्लू पानी मुँह में डाला, उसके बाद दूसरा सिर से घुमाते हुए धार की ओर उछाल दिया। दो कदम और आगे बढ़ रामा ने बाई हथेली तली से चिपकाई व दाहिनी मुट्ठी मथना के किनारे पर कस दी-जै गंगा मैया !
     जै गंगा मैया !
     तीनों पैर-उछाल लेकर पानी की सतह पर औंधे हो गए। गुमका मारता हुआ रामा आगे और बहमा छाँटते दोनों पीछे। पानी का फैलाव अनुमान से अधिक निकला। दोनों बागी पार पहुँचते-पहुँचते पस्त हो गए थे।
     पंडित थक गए क्या  लम्बी साँसे भरते हरिविलास ने पूछा।
     थकान तो आती ही है। मथना से सामान निकालते रामा ने उत्तर दिया।
     तुम आराम से आना-जाना। जल्दबाजी की जरूरत नहीं है। उधर सुस्ता लेना कुछ। औरत वाली बात है। मथना थामने की क्रिया बता देना उसे। हरिविलास ने समझाया।
     बैफिकर रहो कहा रामा पंडित मथना के साथ फिर पानी में आ गया। धार काटते हुए सोच रहा था कि बस आज की रात खेम-कुशल से गुजर जाए। कल इंजीनियर के सामने जाकर खड़ा हो जाऊँगा कि साब तीन साल हो गए सूली की सेज पर सोते, अब तबादला कर दो। जान सदा जोखिम में ऊपर से अपमान।
     सोच में उतराता रामा किनारे आ गया। कंधे पर मथना रख चुचुआती देह लिये वह कमला की दिशा में चलने लगा। हल्की-हल्की हवा से देह ठण्ड पकड़ने लगी थी। चाँद कभी खुलता कभी ढँक जाता। उस पार के आदमी धब्बे की झाँई मार रहे थे। नदी का फैलाव अस्सी-नब्बे हाथ तो रहा ही होगा।
     आ गया  कमला की आवाज आई।
     रामा के मुँह से केवल हूँ निकल सका। आने-जाने में हुई देर पर खींझकर कहीं भड़क न बैठे, इसके डर से रामा सहमा-सा खड़ा हो गया-सामान दे दो, रख दूँ।
     ले ! कमला ने अपने जूते बढ़ा दिए। रामा को लेने पड़े। वह ग्लानि से भर गया-साली नीच जाति की औरत। बड़उआ जाति का कोई ऐसा कभी न करता। उसेन जूते मथना की तरी में जमा दिए।
     और...
     इस बार कमला की पेंट थी। रामा सनाका खा गया। पेंट के साथ चड्डी थी। सिर नीचा किये उसने ये भी भर दिए।
     तेरे घर कौन-कौन है घरवाली है
     बस एक बिटिया है पाँच बरस की। घरवाली तीन साल पहले रही नहीं।
     अच्छा मैं अगर तुझे रख लूँ तो.... जैसे मर्द औरत को रखता है।
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     कुछ कहा नहीं तूने  कमला की आव़ाज कठोर हुई।
     मैं ...क्या कहूँ  तुम ठहरी जंगल की रानी और मैं नौकरपेशा। आज यहाँ, कल वहाँ।
     यहाँ है तब तक रहेगा मेरा रखैला
     अब मैं क्या बोलूँ
     गूँगा है  डर मत ! मैंने जिनकी कुगत की है वे दगाबाज थे। संग सोकर बदनामी करने वाले को मैं नहीं छोड़ती। तुझसे भी साफ कह रही हूँ-ले ये भी रख दें।
     लेने के लिए हाथ बढ़ाते रामा ने देखा कि कमला कमीज़ उतारकर बढ़ा रही है।
     हल्के-से उजाले में कमला की देह किरणें छोड़ रही थी। रामा की आँखें भिंच गई। उसे मथना का मुँह नहीं मिल रहा था। हाथ कभी इधर पड़ता कभी उधर। पसीना छलछलाकर रोएँ खड़े हो गए। नथुनों में कोई विकल गंध भर रही थी। पैर झनझना आए। कसमसाती देह फट पड़ने को हो गई।
     और ये भी....। कमला की काँसे की खनकती हँसी के साथ रामा ने पाया कि वह रेत पर पटक लिया गया है।
           ना....ना ! छोड़ो.....! करता रामा रेत रौंदने में शामिल हो गया।
           थोड़ी देर बाद उस पार से कूक आई। कमला ने कूक से उत्तर दिया कि- सब ठीक है।...ला पेंट निकाल।
           रामा ने अपराधी की तरह पेंट निकाली।
           कमीज...।
           पेंट कमीज कसकर सिर से साफी बाँध कमला ने बंदूक उठा ली-चल पार पहुँचा।
           मथना में दुनाली रखते हुए लोहे के ठण्डे स्पर्श से रामा में कँपकँपी भर आई। वह कमर तक पानी में खड़ा हो कमला के कदम गिनने लगा।

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राज नारायण बोहरे की एक और कहानी

अस्थान
               
      अखिल ब्रह्माण्ड नामक परात्पर ब्रह्म परमात्मा की जय ! सम्प्रदाय के आदि आचार्य महराज की जय! गादीधारी आचार्य महराज की जय ! अस्थान के महन्त मण्डलेश्वर की जय ! सन्त –पुजारी की जय! दाता भण्डारी की जय! अपने-अपने गुरू महाराज की जय!जोर से जयकारा लगाते  बाबा ने भोग लगाया
                तन्दरुस्त बदन, उम्र लगभग चालीस बरस, कन्धों तक फैले खिचडी जटा-जूट, उन्नत ललाट है  बाबा ओमदास  का उन्होंने कण्ठ, माथे और भुजा इत्यादि पर बारह तिलक  लगाए हुए है ,   कमर में केले के पत्ते  का अडिया और उसी का कोपीन धारण कर रखी है। सांसारिक प्राणियों के बीच यात्रा में रहने से  इस समय कमर में रेशमी वस्त्र  लपेटा हुआ है, नहीं तो फक्कड बैरागी काहे की लाज और काहे की शरम !   अस्थान में तो सब साधू  यों ही  हर  हर  हर घूमते रहते है ।
                सामने मिठाई का दौना है जिसमें से परसादी पाने लगे हैं । दो-चार ग्रास पेट में पँहचे तो चैन हुआ। पेट की अगन कुछ सिराने लगी । दो दिन गुजर गए, उस अस्थान पर पंगति में बैठकर भेाजन पाया था। बस तब के क्षण हैं और आज की ढलती साँझ, वे भोजन से भेले’  नहीं हुए । जाने कौन  मनहूस का मुँह देखा है,या कौन बख्त मुँह से उलट-सुलट निकला , सेा  अन्न देवता के दरसन-परसन को तरस रहे हैं ।
                हालाँकि साधुशाही रिवाज के मुताबिक तो वे उलट-सुलट ही बोले थे,लेकिन ओमदास बाबा उसे गलत नहीं मानते। वो तो स बात थी । अरे भाई ,साधु-बैरागियों का  देह-वासना से क्या लेना -देना ? ये भी  मिट्टी , वो भी  मिट्टी,  हर तन  मिट्टी !
                 ये तो दुर्जन के काम हैं , तो शास्त्रों में कहा गया -दुर्जनं दूरतः परिहरेत। अब दूर से ही त्याग आए हैं वे दुर्जनों को ,बल्कि उस समाज के सब जनों को। अघा गए वे उन सारे रीति-रिवाजों और प्रदर्शनों से ।
                सामने की मिठाई उदरस्थ हो चुकी थी, लेकिन बाबा का मन छूट-छूटकर मालवा की सस्य-श्यामला धरती में बने महन्त किरपादास के आश्रम में जा पहुँचता था और वे मन को खींचकर पटरियों पर दौड रही इस रेल  में वापस लाने का यत्न कर रहे थे।इसी खींचतान में आँखों के आगे फिर से तैर उठा था-महन्त किरपादास के अस्थान पर बीता समय।
                पिछले कुम्भ में प्रयागराज में ओमदास की भेंट किरपादास से हुई थी कुछ सत्संग भी हुआ था। दोनों ने साथ-साथ पंचाग्नि तपी थी और भभूत मलकर गंगा माई के तट तक भी साथ-साथ गए थे। तब के क्षणों में किरपादास बोले थे-सन्तजी ,हमने भी कुछ भगत जगत चेताए हैं । मालवा में एक अच्छा अस्थान बनवा दिए हैं । ठाकुरजी की सेवा-टहल और साधु सेवा होती है। कभी फुरसत में आइएगा अस्थान पर। कुछ दिन सतसंग होगा।
                रमते जोगी और बहते पानी का क्या ठिकाना । बाबा ओमदास वह न्यौता भूल गए और छः वर्ष बीत गए।
                तब वे एक जमात के साथ जातरा पर निकले थे । विंध्याचल की घाटी में बने एक स्थान पर जमात कुछ दिन रुकी और वहीं किरपादास के स्थान की चर्चा चली तो बाबा ओमदास को कुम्भ याद आया,  । झोली में से पुस्तक निकालकर उस पर लिखा बाबा किरपादास के स्थान का पता देखा। जमात के महन्त से जाने की अनुमति लेकर बाबा बिदा हुए ।
                महन्त किरपादास का स्थान खूब लम्बा चौडा था मन्दिर में ऊँचे-ऊँचे शिखर दूर से ही दिखते थे । अस्थान पर हमेशा चहल-पहल बनी रहती थी । महन्त जंगल में मंगल कर दिया था।   
                काँधे पर आसन बाँधे और हाथ में चिमटा कमण्डल लिए बाबा ओमदास ने दूर से ही हाँक लगाई -दण्डवत..त.!
                ”दण्डवतsssssssss..त..अस्थान किसी साधु ने जबाब दिया था और वे प्रसन्न होकर आगे बढ़  गए थे ।
                वे सीधे महन्त की गद्दी पर पहुंचे  । किरपादास उन्हें नहीं पहचान पाए थे और अजनबी  महात्मा को अजब निगाहों से ताक रहे थे। ओमदास ने देखा था कि छह बरसों  में महन्त किरपादास का हुलिया बिल्कुल बदल गया था। बदन चिकना हो गया था और खूब लम्बी तोंद भी निकल आई थी, उनके  जटाजूट अब पंचकेश में बदल गए थे तिलक भी बडे करीने से लगाने लगे थे।
                धरती पर तीन बार लेटकर ओमदास ने गद्दी की दण्डवत की और जतन से धरा एक रुपया झोली से निकालकर महन्त जी के चरणों में भंेट अर्पण की ।
                ”कहाँ से आना हुआ संन्त जी का?“ महन्त किरपादास की आवाज में एक रूखापन  था ।
                ”एक जमात के संग-तीरथ-जातरा करके लौट रहे थे कि आपके स्थान पर आने की इच्छा जागरत हुई ,सो दरसन-परसन करने हाजिर हो गये हैं ।
                कहकर बाबा ओमदास ने सोचा कि स्मरण दिलाऊँ-अभी छःवरस पहले ही तो हम दोनों प्रयागराज में कुम्भ के अवसर पर गंगा-तट पर भेंट  कर चुके हैं,  आपके न्यौते पर  अपने राम  आये और बुला के  पूछते  हो  कि...... । फिर  सोचा कि  छोड़ो साधुशाही की परम्परा और टकसाली विधान के अनुसार परिचय के पहले कुछ कहना नियम के प्रतिकूल है , यह समझकर वह चुप ही रहे ।
                ”सन्तजी का नाम और अखाडा द्वारा कौन  सा है?“
                ”संसार परब्रह्म परमात्मा का , सम्प्रदाय गादी महाराज का,  आशीर्वाद गुरू महाराज का,  साधु-समाज और आप सबका दिया हुआ मेरा नाम श्री ओमदास है। एक पल को  रुक वे अपना  गुरु स्थान  बखान  उठे -
                ”आदि आचार्य महाराज के सम्प्रदाय में दादा गुरू एक हजार आठ  श्री श्री गंगादास जी महाराज के शिष्य  श्री श्री एक सौ आठ श्री प्रयागदास महाराज ही हमारे गुरू महाराज हैं ।अखाड़ा द्वारा राजस्थान है-महाराज ।
                ठीक से उत्तर  पाकर महन्त ने समझ लिया साधू टकसाली है,खडिया  नहीं है । उनके चेहरे पर सन्तोष झलका। बोले -ठीक है सन्तजी, सन्त-निवास में आसन जमाइए,पारखत मले हो रहे हैं । आप भी कुआँ पर जाकर असनान बना लीजिए, दर्शन कीजिए और पंगति पाइए। बाबा ने माथा झुकाकर सम्मति प्रकट की और अस्थान के पिछले हिस्से में बने सन्त-निवास की और चल दिए। अस्थान सचमुच बडा सुन्दर था। चारों ओर से पेडों से घिरा हुआ था। बस्ती से तीन मील से भी दूरी के एकान्त मन्दिर होने से फालतू की चें-चें,पैं-पैं से मुक्ति थी यहाँ। भजन करने के लिए एकदम उम्दा अस्थान थे ।
                मन्दिर के पीछे भण्डारग्रह था और उसी से लगी हुई गौ शाला । औमदास का मन प्रसन्न हेा उठा यानि कि अस्थान पर गौ सेवा भी होती है। सन्त-निवास देखकर तो तबियत टन्न हो उठी । स्सफ  सुथारा ,लिपा पुता , जालीदार  दरवाजा, मच्छर  की  टिकिया से महकता खूब लंबा कमरा था, कितने  सारे तख्त और  चबूतरे  थे वहां ! कई साधु सन्त-निवास में विश्राम कर रहे थे ।
                एक चट्टी पर आसन जमाकर उन्होंने कमण्डल लिया और  चांपा कल पर चले गए । खूब मल-मलकर असनान बनाए ।
                कोंपीन बदली और अपना दैनिक पाठ करते हुए ही वे भीतर मन्दिर में पहुँचे। आहा! क्या खबसूरत चिन्ह पधराए हैं । बस देखते ही रहो ।प्रणाम करके परिक्रमा में गए तो कोने में खुलटा हुआ   
एक दरवाजा दिखा।
                कौतुहल से भीतर झाँका तो हृदय गदगद हो गया । एक बूढे साधु को घेरे दस-बारह बालक दास बैठे थे । बूढे बाबा उन सबको सिद्धन्त पटल ठाकुर टहल बता रहे थे । श्रद्धाभिभूत होकर बाबा ओमदास ने बूढे बाबा को दण्डवत की ।
सच्चे टकसाली साधु को सिद्धान्त पटल और ठाकुर टहल तो रटे हुए होना चाहिए ।उनकी यह धारणा और अधिक पुष्ट हो गई । ओमदास बूढ बाबा के निकट पहुँचे तो सारे नए चेलों ने ओमदास को एक स्वर में दण्डवत की।
                बूढे बाबा ने ओमदास के अखाडा और द्वारा जानकर सन्तोश प्रकट किया फिर एकाएक पूछ बैठे-सन्त जी ,जानते हो ,माथे में कितने बाल हैं।
                ”बाल तो दो ही हैं बूढ बाबा,एक सफेद और दूसरा काला ।
                ”और लंगोटी में कितने धागे हैं ओमदास ?“
                ”लंगोटी में भी दो ही धागे हैं एक आड़ा और दूसरा ठाड़ा ।
                ”इस दुनिया में सबसे बडे यात्री कौन है सन्त जी?“
                ”सूरज और चन्दा से बढकर दूजा कौन बडा यात्री होगा,महाराज ।
                ”मानुस  जैानि के करम का सबसे बडा रखवाला कौन है महात्माजी?“
                ”दो नेत्र और आत्मा ही सबसे बडा रखवाले हैं बूढ़े  बाबा।
                सारे  उत्तर  बिना संकोच और हिचकिचाहट के मिले तो बूढ़े महात्मा के चेहरे पर संतोष के भाव आए । उन्होंने ओमदास से कुशल-क्षेम पूछी ।ओमदास उठे और बाकी परिक्रमा पूरी करने लगे ।
                परिक्रमा पूरी करके फिर वे निज मन्दिर के सामने आ पहुँचे । वहाँ साष्टांग  प्रणाम कर जब वे भण्डारघर में घुसे तो भूख से पेट में कुलबुलाहट होने लगी थी। भण्डार में पंगति की तैयारी हो रही थी ।
                फिर तो उनके चार दिन चुटकी बजाते ही बीत गए।  प्रातः सूर्योदय के पूर्व ही असनान बनाते । दोपहर एक ओर चले जाते और पाँच स्थान पर अग्नि जलाकर पंचाग्नि तापने बैठ जाते । दोपहर -ढले वहाँ से उठते, तब जाकर परसादी पाते । इस नए        अस्थान पर उन्हें खूब आनन्द आया।
                बस किरपादास की दिनचर्या उनकी समझ में नहीं आई ।  और सब साधु जहाँ ब्रह्म-मुहूर्त में जग जाते वहीं महन्त किरपादास तो श्रंगार -आरती के कुछ देर पहले ही जागते हैं और जल्दी -जल्दी अपने प्रातः क्रिया कर्म से निवृ हो लेते हैं । फिर एक बार गादी पर जमे तो सीधे पंगत में उठते हैं । दोपहर में विश्राम करके तीसरे पहर भी वे सीधे उठकर गादी में पसर जाते हैं वहीं लेटे-बैठे हुकुम देते रहते और चपाटी दौडकर टहल पूरी करते रहते। शाम को किरपादास नेताओं से धिरे बैठे रहते हैं । छिः छिः! आजकल साधु भी राजनीति की वेश्या पर रीझने लगे हैं न।
                यों तो किरपादास की उम्र ज्यादा नहीं है । वे भी ओमदास की ही उम्र के हैं लेकिन दोनों में कितना अन्तर है। इधर तो बाबा ओमदास गुरू कृपा से ब्रह्ममुहूर्त में ही जग जाते हैं और सूर्योदय तक अपने नेम-धर्म से निवृ हो लेते हैं ।उधर बडे आलसी हैं बहुत ममतालु हैं ,किरपादास अपनी गादी के लिए। नेम-धर्म के लिए तो समय ही नहीं उनके पास। गुसाई महाराज सच कह गए हैं जाके  नख और जटा विसाला,सोई तापस प्रसिद्ध कलिकाला ।
                साधना तो नागा साधुओं की जाकर देखो वसन और वासना से दूर रहकर कैसे वे अपने शरीर को तपा-तपाकर कंचन बना लेते हैं । कुम्भ में और सम्प्रदायों के लोग भी आए थे । रामानन्द सम्प्रदाय ,रामानुज सम्प्रदाय,निम्बाकाचार्य, एक-से-एक तपेश्वरी साधु ।हर सम्प्रदाय के साधु सच्चे ब्रतधारी और पूरे बैरागी! पर ओमदास को खुद के सम्प्रदाय में सब बावन गज के लगते हैं ।
                उठकर खिडकी से झाँका, तो विस्मय हुआ। महन्त किरपादास बाहर खडे थे ,कमर में केवल कोपीन था शेश सारा वदन उघारा था। सामने एक नया चेला था। गोरा चिकना -सा,चेला भी नंगे वदन केवल कोपीन लगाए था।महन्त के कमरे के आगे खडे दोनों हँस-हँसकर बतिया रहे थे।
                ...च्च...च्च...च्च। तो बडी गलती बात है। अभद्र तरीका है।ऐसे भी खड़ा  हुआ जाता है। वे बुदबुदाए।
                विचार आया कि सन्त -निवास से बाहर निकलकर उधर ही जा पहँचें पर दूसरे  पल ही सोचा कि अपने को क्या करना ,अपनी करनी पार उतरनी ।लेकिन उनका मन कब इस जुमले को स्वीकार करता है !अगर ऐसा होता तो उस विसरामपुर वाले अस्थान की बदनामी न होने देते । हालाँकि गुरू महाराज कहते थे , ”ओमदास तुम्हें तो कहावत सारी के पाँव पकडकर बैठ गए। भले आदमी ऐसी बातें तेा कायर सोचते हैं । आलसियों के विचार हैं जो तो ।े
                पर वे आलसी नहीं हैं ।बचपन से मेहनत की है उन्होंने ।सोलह साल उमर से हल हाँका है। पस्टार फेरी है। दावन-उडावनी की है और पन्द्रह कुण्टल के गल्ले से लदे पाल की गाडी  के धुरारिया बनके मण्डी तक ले गए हैं ।
                बूढे होते पिताजी ने बडे भाई को पहले ही पढाई छुडा दी थी और आठवाँ दरजा चढते-चढते उन्हें भी खेत का रास्ता दिखा दिया तेा वे भी कान से ऊँची लोहांगी लेकर खेत -टगर में भटकने लगे थे। खेती के सारे काम बडे सुघड तरीके से सँभाल लिए उन्होंने ।
                उन्हीं दिनों कोई सगया आए थे, उनकी सगाई लेकर । पिताजी ने सगयों को  निर्विकार  भाव से कुल-परम्परा सुना दी थी कि उनके खानदान में मँझला लडका कुँआरा रहता है ,इसलिए ओमसिंह की तो शादी होनी नहीं है । ओम से छोटे की करने तैयार हैं। तब ओम से छोट पप्पू दूल्हा बन गए थे और ओमसिंह की भीतरी दुनिया सूरीसूनी हो गई थी । उनके मन में उठती श्रंगारिक भावनाएँ सीधे रास्ते के बजाय गली -छेडी तलाशने लगी थीं ।
                घर वालों पर बेहद खपा थे वे ।मन-ही-मन में योजना जरूर बनात रहते थे कि कोई लडकी बस पट जाए उनसे । चाहे किसी भी बिरादरी ही क्यों न हो, लेकर ही भाग जाएँगे । गुर्राते रहें घर वाले-अपनी करनी पार उतरनी ।खेती किसानी के काम से उन्हें प्रायःबूढे पुरानेां में बैठना पडता था और धीरे-धीरे भजन गाने का शोक होने लगा था। गाँव की रामलीला में वे भक्तों के पार्ट करने मेेें सिद्ध-हस्त होने लगे थे और फिर आदतन वे दुनियादारी से वैराग्य की बातें सोचने लगे । बोलने लगे धरम-करम की बाते और विशय-वासना की बुराई करते -करते वे आए वैरागी हो सके । आसपास कहीं जग्य होता ,कोई प्रवचन होते, ओमसिंह का डेरा कई-कई दिनों के लिए वहीं जम जाता । वे खूब सतसंग करते ।किसी साधु जमात का आना होता तो वे विस्मृत से होकर साधु-सेवा में जुट जाते। साधुओं से देश-परदेश की बडे ध्यान से सुनते । गाँव की चौहद्दी में हमेशा फिर रहा उनका मन , चौहद्दी तोडकर बाहर आने को उत्सुक हो उठता। उनका वेश भी धीरे -धीरे साधुओं का हो गया । केशरिया कपडे और अस्त-व्यस्त दाडी बाल तथा रंग -बिरंगे टीका छापे लगाने लगते । खेती सूखे या आग लगे उन्होंने चिन्ता करना छोड दिया । बल्कि जो भी हाथ में पडता है वे दान-पुण्य करने से न चूकते।
                एक बार बडे ने उन्हें टोका कि अच्छे -खासे किसान होने के बाबजूद काहे के लिए पराश्रितों की तरह साधु भिखमंगे बने फिरते हैं । पप्पू ने भी बडे का समर्थन किया तो उनका मन बिल्कुल खिन्न हो गया । वे खेती बाडी के काम से कतई दूर रहने लगे । घर में उनकी हेंसियत गैरजरूरी जीव की तरह हो गई थी । ज्यों-ज्यों घर से उनका मन दूर होता गया,भजन-पूजा में उन्हें आनन्द आता गया । उन्हें यह दुनिया स्वार्थी और विशयी लगने लगी थी ऐसा ही झगडा चलते एक दफा वे सन्न रह गए, जब उन्हें भाइयों ने पागल करार दे दिया और एक अखवार में छपा भी दिया ।इच्छा तो हुई कि इस अन्याय का जमकर प्रतिकार करें लेकिन मन में बस गए वैराग्य ने उन्हें रोक दिया।
                उन्हीं दिनों एक साधु जमात के साथ वे घर छोडकर भाग निकले थे ।बिसरामपुरा का अस्थान उनका पहला गाँव था। जमात ने उन्हें वहाँ छोडा और आग निकल गई । जमात के महन्त ने स्पश्ट कहा था कि वे टकसाली साधु नहीं बने हैं ,खडिया ही हैं। ,क्योंकि न उन्हें सिद्धान्त पट ल को ज्ञान है न ठाकुर टहल का निगुरे तो हैं ही।
                उन दिनों बिसरामपुर की गद्दी पर महन्त किशोरदास थे । अस्थान पर जनता की भारी भीड इकट्ठा होती थी ।संजा-आरती में एक डेढ सौ भगत हर मौसम में मौजूद रहते ।हाँ अस्थान पर साधु-सन्यासी कम रहते थे ।महन्त एक दिन से किसी को ज्यादा टिकने ही नहीं देते थे । ओमसिंह को पाकर किशोरदास ने सोचा कि इस हट्टे-कट्टे आदमी को चेला मूढ लो ,अच्छा सेवा टहल करेगा। उन्हें अस्थान पर रुकने के लिए अनुमति दे दी थी
                बिसरामपुर का यह स्थान बस्ती से पाँच किलोमीटर दूर था और बीच रास्ते में थोडा जंगल पडता था ।साधुओं और जमातों का आना जाना कम ही था ।इसलिए यहाँ साधुशाही रिवाजो ं की फिकर कोई नहीं करता था। महन्त ने एक औरत रख छोडी थी ,जो प्रगट में तो अस्थान पर गोबर समेटने का काम करती थी ,लेकिन ओमसिंह ने उसे कई दफा रात-विरातजब महन्त के कमरे से निकलते देखा तेा नफरत से भर गए थे।एक रात तो जीप में आठ-दस बन्दूकधारी  आए थे, किशोरदास से मिलने। तब ओमसिंह वहाँ की गडबडशाला में उलझ ही गए थे-ये क्या ?

                उस दिन बिल्कुल सुबह के केले के पत्ते  की कोपीन बनाने के लिए जब फुलवारी में किशोरदास मौजूद था। उसने वहीं से पुकार कर कहा था -इधर मत आना भाई । आना निशेध है । विस्मित ओमसिंह ने सोचा था कि बगिया में एसी कोई चीज होगी , जिसे टकसाली साधु ही छू पाते हैं ।वे चुपचाप लौटकर अपनी नित्यक्रिया में लग गए थे।
                वह रहस्य तीन दिन बाद खुला था , जब पुलिस ने पूरा अस्थान घेर लिया था। तलाशी हुई थी और बगिया में गांजे के पचास पौधे मिले थे ,तो उनका माथा ठनका था ।देखने वाले तो हक्के-बक्के रह गए थे ,जब किशोर के कमरे से पुलिस ने पुरानी मूर्तियों का जखीरा बरामद किया था। पुलिस महन्त किशोरदास को गिरफ्तार करके ले गई थी और ओमसिंह बडबडा उठे थे-पहले कोर में मछली ब्यानी ,छोडो भोजन बोले ज्ञानी ।
                अस्थान के और साधुओं को भी पुलिस ने परेशान करना चाहा लेकिन शहर के एक-दो प्रभावशाली भक्तों के हस्तक्षेप से मामला दब गया था और मात्र किशोरदास को अपने पास रखकर मुकदमा चलाया था।
                उस दिन भी उन्हें लगा था कि उल्टे पैरों गाँव लौट जाँए,पर गाँव की परिस्थिति तोऔर ज्यादा असहनीय थी न,सो मन मसोसकर रह गए थे । आसपास के तमाम वैरागी इकट्ठा हुए और किशोरदास को निश्कासित कर दिया गया ।फिर मंगलदास जी को महन्ताई सोंपी गई थी।तब वे नहीं थे ।मंगलदास जी के गुरूभाई प्रयागदास जी महाराज से ओमसिंह का परिचय नहीं हुआ था सीधे-सच्चे तपस्वी सन्त प्रयागदास जी महाराज ज्ञान का अदभुत भण्डार थे। ओमसिंह ने उन्हीं की सेवा आरम्भ कर दी थी। साधु समाज से उठ गई उनकी श्रद्धा प्रयागदास जी के कारण दुबारा जागी थी।
                एक दिन झिझकते हुए ओमसिंह ने चेला बनने की इच्छा व्यक्त की तो प्रयागदास जी टहलते रहे, बाद में बेमन से उन्होंने हामी भरी थी । फिर एक दिन सिद्धान्त पटल में बताई प्रक्रिया से उन्हें शिश्य बनाया गया , अर्थात दक्षकर्ण वदेमन्त्र गिवारं पूर्णमानसः। मन्त्रार्थ मन्त्र बीज वेतराड भित स्वर फला दिवम।
                सबसे पहले उन्हें आसन जमाना सिखाया । आसन रखते समय वे मन्त्र बोलते -ओम भूरभुवः स्वःकूर्माय नमः।
                पृथ्वी की प्रार्थना करते समय उन्होंने मन्त्र रटा- ओम पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं श्णिुना धृता। त्वं व धारण्य मां देवि पवित्रं कुरू चासनम।
                हर क्रिया का मन्त्र उन्होंने सौ-सौ बार रटा तब याद हुआ। उन्हें सिद्धान्त पटल और ठाकुर टहल रोज सबेरे गुरूजी खुद रटाते । सुबह से शाम तक की सारी क्रियाएँ वे बडे मनोयोग से करते बल्कि इतने मनोयोग से करते कि साधु बनने के मूल उद्देश्य का कर्म भी उतने मनोयोग से न कर पाते ।
                गुरूजी ने ओमदास नाम दिया। वेश समझाया ,कमण्डल का आकार ,कोपीन का तरीका ,तिलक -छापों का रहस्य सब कुछ बच्चे की तरह समझाया । साधु और खडिया साधु के गुप्त  भेद भी दिखाए ।
                मंगलदास जी महन्त बने तो बिसरामपुरा अस्थान के रंग-ढंग ही बदल गए। वहाँ न कोई नशेलची रहा न पाखण्डी। हर चीज में साधुशाही का ख्याल रखा जाने लगा । हर प्रक्रिया बारीकी से देखी-परखी जाने लगी ।एक घटना तो उन्हें आज भी याद है ।कैसा मनोरंजन नजारा पैदा हुआ था वहाँ। खाने-पीने में खास चीजों का विशेश ख्याल रखने वाले उस अस्थान पर एक साधु छुपकर लंका मिर्च और बन लडडू (प्याज) खाता पकडा गया तो पंचायत इकट्ठी हुई थी और पंचायत ने उस साधु के लिए पंचायती मार का दण्ड तजवीज किया था। फिर कम्बल उडाकर साधु की एसी पिटाई हुई थी कि तीसरे दिन वह साधु भाग निकला था और बाकी साधु उस पर हँस उठे थे ।
                गुरूजी के साथ ओमदास यात्रा पर निकले थे। उन्हें याद है कि फूलपाटे का अस्थान उन्हें रात में छोड देना पडा था। क्यों कि वहाँ महन्ताई को लेकर पुजारियों में चल रही लट्ठमार लडाई रात को अचानक ही रक्त-रंिजत हो उठी थंी ।कई जगह इस घटना का उन्होंने जिक्र किया था । जिक्र तो उन्होंने सिंह वासे के अस्थान का भी कई जगह किया था जहाँ कि गुरू-चेला के बीच (दानमें मिले)कम्बल को लेकर झगडा हो उठा था। साधु संसार का मजा लेते वे बहुत दिनों तक घूमते रहे थे ।
                ”बाबा अपना टिकट दिखाइए!टिकट चेकर ने बाबा ओमदास का मन को मंगलदास जी के अस्थान से खींचकर भागती ट्रेन में ला पटका था ।
                मिठाई का खाली दोना जस-का-तस रखा था। ओमदास ने उठाकर खिडकी से बाहर फेंका व कमण्डल के जल से हाथ अमनिया किया । काँधे की झोली से अपना टिकट निकालकर उन्होंने चेकर को दिया और ठीक से बैठ गए।
                टिकट पर निशान लगा कर चेकर आगे बढ गया तो ओमदास ने टिकट पुनः झोली मंे रखा और बाहर झाकने लगे ।
                दूर कोई गाँव दिख रहा था। गाँव से हटकर एक अस्थान भी नजर आ रहा था । अस्थान के ऊँचे झण्डे निशान और शिखरों के कलश यहीं से नजर आ रहे थे। बाबा किरपादास के अस्थान पर सन्त-निवास में उस दिन वे दोपहर को लेटे हुए थे और अचानक वह निशाधारी हँसी गूँजी थी । फिर महन्त और उनका नया चेला एकाएक गायब हो गए थे ।अकुलाए से ओमदास बाहर आ गए थे और महन्त का कमरा अन्दर से बन्द देखकर उधर ही बढ लिए थे ।
                दरवाजे की झिरी में से उन्होंने देखा आज याद करते भी लाज आती है और उनका चेहरा इस समय भी तन आता है ।
                वे तुरन्त लौटे थे और अपना आसन बाँधने लगे थे ।
                अस्थान छोडकर आते समय वे महन्त के दरवाजे पर रुके थे उसे जी भर गलियाते रहे थे ।महन्त भीतर चुप बैठा उनकी गालियाँ सुनता रहा था। क्रोध मे खदबदाते ओमदास वहाँ से पैदल चले तो रुके नहीं थे । लगातार चलते रहे थे । जब खूब थक गए तो एक पेड का आसरा ढूँढ उसी के नीचे रात को लेट गए थे । नींद किसे आनी थी । सारी रात करवट बदलते रहे ।सुबह उठकर अनमने ढगं से नेम-कर्म निपटाया और फिर चल पडे थे निकट के रेलवे स्टेशन की तरफ जहाँ कि कल रात बारह बजे पहुँच  सके वे ।
                ये दो दिन बडे उहापोह में बीते हैं ।घिन सी होने लगी है उन्हें अपने वेष पर। इसी
वेष पर रीझ उठै थे वे ।क्या मिला उन्हें । घर छूटा ,गाँव छूटा ,भाइयों से अलहदा हुए,बुराई
भी हुई । जीवन भर का हक मारा गया । आज पराश्रित होकर रह गए हैं ।
                साधुओं को देवता समझते थे वे ,पर आज जाना कि वे तो पूरा आदमी भी नहीं हैं
अरे संसार के सिरजनहार ने संसार में मर्द के साथ औरत बनाई है तो इसका केाई मतलब
ही होगा ।औरत के बिना आदमी अपूर्ण ही रहता है। आखिर कहाँ ले जाऐगा आदमी अपना
शरीर ,अथवा मन।शरीर भी कुछ चाहता है और मन भीं। कब तक दबाओगे इसे ?और ज्यादा
दबाओगे तो रोग-बीमारी ही फैलेगी । नहीं तो फिर उल्टे-सीधे साधन अपनाने पडेंगे जैसे
ओमदास शुरू से अपनाते रहे गाँव में या फिर किशोरदास और किरपादास ने किया।
                साधु बनकर जितनी तन्मयता से उन्होंने क्रिया-कर्म किए उतना तो कभी भजन भी
नहीं कर सके। मंजिल की तरफ ध्यान कहाँ रहा उनका , वे तो रास्ते मंे ही उलझे रह गए।
मेहनत से दूर होते गए तो शरीर भी आलसी होता गया। हर चीज अपनी कुब्बत से लेना तो
भूल चुके वे । माँग -मूँग कर पेट भरना अपनी नियत बना ली उन्होंने।
                इन दिनों तो उन्हीं लोगों की चलती हो गई है जो हर जगह अपने वेश का लाभ
लेते रहे। अब तेा हर साधु नेता बनना सीख रहा है।जिसे देखो वो राजनीति करने अयाध्या
जा रहा है। जैसी धन-सम्पत्ति  साधुओं के पास देखी वैसी तो किसी गृहस्थ-सेठ के पास भी न
होगी। ऐसे वैरागियों के बारे में गुसाई जी महाराज कह गए हैं-
                 ”तपसह  धनवंत दरिद्र ग्रही।
                  कलि कौतुक तात न जात कही।।
                ओमदास के गुरूजी इन चीजों से बहुत मुक्त थे। न किसी अस्थान की चाह रही उनमें
,न कोई धन-सम्पत्ति  जुटाई उन्होंने ।मंगलदास जी ने बहुत यत्न किए कि वे स्थायी बनकर रहें
व गल्ला-मण्डी से दान में मिलते गल्ले का हिसाब-किताब वे खुद रखें ताकि मन्दिर -निर्माण
के सही खर्चे लोंगो को बता सकें पर गुरूजी इतना ही बोले थे किसाधु का जमीन-जायदाद
से क्या लेना देना।उसे तो अपना सुधार करना चाहिए। गोल बाध्ँाने से क्या होता है,अरे,भजन
करना है तो अकेले जुटो।वे रस्सा तुडाकर भाग निकले हैं।
                वे लगातार सोचते रहे हैं कि अब कहाँ जाँए ।इस साधु समाज से तो उनका गले-गले
तक मन भर गया है इसलिए किसी अस्थान पर जाने का तो कभी नहीं सोच सकते। हाँ,गाँव
के बारे में विचार किया जा सकता है..पर..गाँव में कोन है उनका ..दानों भाई तो नाता तोड तोड ही गए हैं उनसे, और माता -पिता अब जीते नहीं हैं । हाँ यार दोस्त बहुतेरे हैं ,उन्हें चाहते भी थे वे लोग। फिर जननी जन्म भूमि तो सबकी प्यारी होती है न।
                लेकिन लौटकर क्या अपने गाँव में फिर से खप सकेंगे वे। गृहस्थों की दुनिय दुबारा
कैसे घुल मिल सकेगें जिसे काफी दिन पहले बुरी मानकर छोड आए थे वे। गाँव में से वे बुराइयाँ तो खत्म हो नहीं गईं होंगी,जो उस समय प्रचलित थीं ।..तोे..क्या साधु समाज में ही
बने रहें?वे सचमुच बडी कसमकस में फस गए है।-भई गति साँप छछूँदर केरी ।
                बडे सोच-विचार के बाद उन्होंने तय किया है कि वे गाँव लौट जाएँगे। तपस्या ही करनी है तो गाँव में करंेगे। लोगों को जगाएँगे,यह भी एक तपस्या है।
                अपनी जमीन के लिए हक्क के लिए जूझेंगे,लडेगे ।हक पाकर कडी मेहनत से खेती
करेंगे ।
                और..और अगर कोई मिली तो ब्याह भी कर लेंगे खुले आम ।इसमें कैसा संकोच !संकोच और लाज तब हो जब चोरी-छिपे कुछ किया जाए ।इसी दुराव-छिपाव के भाव को ही तो पाप कहतें हैं न।
                अपना वेश उन्होंने इसीलिए नहीं उतारा है कि अब गाँव जाकर ही वेश का अन्तिम
संसकार करेंगे।यही सोचकर वे इस ट्रेन में बैठ गए हैं जो उन्हें गाँव ले जा रही है।
                साझँ हो चुकी थी।खिडकी से सर्द हवा आ रही थी ।उन्होंने खिडकी के बाहर नजर डाली ।गाडी किसी नदी से गुजर रही थी। किनारे पर बने किसी अस्थान में जगमगाते बिजली के बल्व यहाँ तक दिख रहे थे।उन्होंने झुँझलाकर खिडकी की शटर गिरा दी ।
                अस्थान उनकी आँखों से ओझल हो गया।

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माया महा ठगिनी हम जानी

      कहानी राजनारायण बोहरे                             माया महा ठगिनी हम जानी               ये हुआ ठंड का मौसम , कोलाहल में था ल...